णमो अरिहन्ताणम् (Salutations to the Arihantas)
यह पाठ ऋषभदेव के राजा से समाज-सुधारक, त्यागी साधक और जैन परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर आदिनाथ बनने की प्रेरक यात्रा को सरल संस्कृत कथा के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
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कथा के आरम्भ में नाभि नामक एक प्रसिद्ध राजा का वर्णन है। वे राजनीति, युद्धनीति और प्रशासन में समर्थ थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और करुणाशालिनी थीं।
उनके प्रिय पुत्र ऋषभ शिक्षित, गुणसम्पन्न और राजनीति के ज्ञाता थे। युवावस्था में उनके गुणों को देखकर राजा नाभि ने उन्हें राज्य का भार सौंपने का विचार किया।
कथा — ऋषभदेव की जीवन-यात्रा
1. राज्य में संकट
एक समय समाज में दुर्भिक्ष, पारस्परिक विद्वेष और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं। राजा नाभि ने इसे ऋषभ की राजनीतिक क्षमता की परीक्षा का उचित समय माना और राज्य उन्हें सौंप दिया।
राजा बनने के बाद ऋषभ ने तुरन्त समस्याओं के मूल कारणों को समझने का प्रयास किया। उन्होंने पाया कि जनता में आलस्य, कृषिकार्य की कमी और उत्पादन-क्षमता का अभाव मुख्य समस्याएँ थीं।
2. ऋषभदेव बने समाज-सुधारक
ऋषभ ने लोगों को केवल सहायता देने के बजाय उन्हें जीवनोपयोगी कौशल सिखाने का निर्णय लिया।
इन कौशलों के कारण लोग सक्रिय और स्वावलम्बी बने। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी और राज्य फिर से समृद्ध हुआ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥
3. विनिता नगर और सुशासन
ऋषभ ने समाज में फिर से शान्ति, सुरक्षा और न्यायिक व्यवस्था स्थापित की। उनके कुशल शासन से विनिता नामक नगर विकसित हुआ।
जनता उनके शासन और समाज-कल्याण से प्रभावित होकर उन्हें प्रेमपूर्वक राजा ऋषभदेव कहने लगी।
उनका साम्राज्य भी विस्तृत हुआ। उनके पुत्रों में भरत और बाहुबली विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। उनकी पुत्रियाँ ब्राह्मी और सुन्दरी भी शास्त्रों में निपुण थीं।
4. जीवन बदल देने वाली घटना
ऋषभदेव राजमहल में अत्यन्त सुखी जीवन बिता रहे थे। एक दिन महल में नृत्य-प्रदर्शन आयोजित हुआ। नृत्य करती हुई एक स्वस्थ नर्तकी अचानक भूमि पर गिरकर मर गयी।
इस घटना ने ऋषभदेव को भीतर से विचलित कर दिया। उनके मन में अनेक प्रश्न उठे— जीवन क्या है? मृत्यु इतनी अचानक कैसे आ सकती है? क्या संसार का सुख स्थायी है?
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥
5. साम्राज्य का त्याग
ऋषभदेव ने विचार किया कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। स्थिर और वास्तविक सुख की खोज के लिए उन्होंने राजवैभव छोड़ने का निर्णय लिया।
उन्होंने विशाल साम्राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। विनिता राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबली को दी गयी।
इसके बाद वे भिक्षु के रूप में जीवन का परम सत्य खोजने निकल पड़े। अनेक लोग उनके शिष्य बनकर साथ चलने लगे।
6. तपस्या और मौन साधना
ऋषभदेव जंगलों में मौन रहकर ध्यान और निरन्तर अध्ययन करते थे। वे साधना में इतने लीन रहते कि भोजन-पान तक भूल जाते।
उनके अनुयायी भी उनके साथ रहते थे, पर उनके लिए इतना कठोर उपवास कठिन था। इसलिए वे जंगल से फल और शाक लेकर जीवन बिताने लगे।
ऋषभदेव ने समझाया कि जैन संन्यासी वृक्षों से स्वयं फल-शाक तोड़कर न लें। उन्होंने स्वयं भिक्षा माँगकर उदाहरण प्रस्तुत किया।
7. भिक्षा की कठिनाई
ऋषभदेव मौन होकर घर-घर भिक्षा के लिए जाते थे। लेकिन लोग अपने पूर्व महाराज को देखकर यह नहीं समझते थे कि उन्हें भिक्षा में भोजन देना चाहिए।
लोग उन्हें आभूषण और बहुमूल्य वस्तुएँ देते थे। ऋषभदेव इन्हें स्वीकार नहीं करते थे क्योंकि उन्हें भोजन की आवश्यकता थी।
इस कारण उनका उपवास बहुत लम्बा हो गया। पाठ में बताया गया है कि उन्होंने निरन्तर चार सौ दिनों तक उपवास किया।
8. श्रेयांस द्वारा इक्षुरस का दान
एक दिन ऋषभदेव हस्तिनापुर के पास एक गन्ने के खेत के निकट पहुँचे। वह खेत उनके प्रपौत्र श्रेयांस का था।
श्रेयांस ने अपने प्रपितामह को पीने के लिए इक्षुरस — गन्ने का रस दिया। इससे ऋषभदेव का दीर्घ उपवास समाप्त हुआ।
वह दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया था। इसी प्रसंग से पाठ जैन परम्परा में वर्षीतप-पारणा की परम्परा को जोड़ता है।
9. केवलज्ञान की प्राप्ति
दीर्घ तप, निरन्तर अध्ययन और साधना के बाद ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया।
वे जैन परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर माने गये और आदिनाथ नाम से प्रसिद्ध हुए।
10. जैन सङ्घ की व्यवस्था
जनसमाज के मार्गदर्शन के लिए ऋषभदेव ने चार भागों की व्यवस्था बतायी—
| क्रम | वर्ग | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | भिक्षुः | संन्यासी पुरुष |
| 2 | भिक्षुणी | संन्यासिनी |
| 3 | श्रावकः | गृहस्थ पुरुष अनुयायी |
| 4 | श्राविका | गृहस्थ महिला अनुयायी |
इन चारों से बना क्रम पाठ में जैन सङ्घ कहलाता है।
णमोकार / नवकार महामन्त्र
पाठ में जैन परम्परा का प्रसिद्ध नवकार मन्त्र प्राकृत भाषा में दिया गया है।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
| प्राकृत पद | संस्कृत अर्थ | सरल हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| णमो अरिहन्ताणं | नमामि अरिहन्तान् | अरिहन्तों को नमस्कार |
| णमो सिद्धाणं | नमामि सिद्धान् | सिद्धों को नमस्कार |
| णमो आयरियाणं | नमामि आचार्यान् | आचार्यों को नमस्कार |
| णमो उवज्झायाणं | नमामि उपाध्यायान् | उपाध्यायों को नमस्कार |
| णमो लोए सव्वसाहूणं | नमामि लोके सर्वसाधून् | संसार के सभी साधुओं को नमस्कार |
जैनमत के प्रमुख सिद्धान्त
1. अहिंसा
मन, वाणी और कर्म से किसी जीव को हिंसा न पहुँचाना।
2. अनेकान्तवादः
सत्य के अनेक पक्ष हो सकते हैं। किसी विषय को केवल एक दृष्टिकोण से देखना पर्याप्त नहीं हो सकता।
3. स्याद्वादः
कथनों को परिस्थिति और दृष्टिकोण के सापेक्ष समझने की पद्धति।
4. अपरिग्रहः
आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।
जैन दर्शन के तीन रत्न
सत्य और धर्म के प्रति उचित दृष्टि।
सही और यथार्थ ज्ञान।
ज्ञान के अनुसार उचित आचरण।
पञ्चमहाव्रतानि
| व्रतम् | सरल अर्थ |
|---|---|
| सत्यम् | सत्य बोलना और सत्य का पालन करना। |
| अहिंसा | जीवों को मन, वचन और कर्म से हानि न पहुँचाना। |
| अस्तेयम् | जो वस्तु अपनी नहीं है उसे न लेना। |
| अपरिग्रहः | आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। |
| ब्रह्मचर्यम् | संयमित एवं अनुशासित जीवन जीना। |
प्राकृत भाषा का परिचय
भारत की भाषा-परम्परा अत्यन्त समृद्ध रही है। एक समय अनेक प्राकृत भाषाएँ सामान्य लोगों के संवाद की भाषाएँ थीं।
| प्राकृत का प्रकार | पाठ में दिया गया सन्दर्भ |
|---|---|
| आर्षप्राकृतम् | प्राकृत की एक प्राचीन परम्परा |
| मागधीप्राकृतम् | प्रमुख प्राकृत रूप |
| शौरसेनीप्राकृतम् | अनेक नाट्यग्रन्थों में प्रयुक्त |
| महाराष्ट्रप्राकृतम् | महाकवि हाल की गाथासप्तशती से सम्बद्ध |
| पैशाचीप्राकृतम् | प्राकृत का एक रूप |
| चूलिकाप्राकृतम् | प्राकृत परम्परा का एक प्रकार |
| अपभ्रंशप्राकृतम् | उत्तरवर्ती प्राकृत रूप |
पाठ के अनुसार जैन आगम अर्धमागधी में लिखे गये। महाराष्ट्री प्राकृत में महाकवि हाल ने गाथासप्तशती की रचना की और शौरसेनी प्राकृत का उपयोग अनेक नाट्यग्रन्थों में हुआ।
जैनधर्म के 24 तीर्थङ्कर
पाठ के स्वाध्याय भाग में जैन परम्परा के चौबीस तीर्थङ्करों के नाम दिये गये हैं।
| क्रम | तीर्थङ्कर |
|---|---|
| 1 | ऋषभदेवः — आदिनाथः |
| 2 | अजितनाथः |
| 3 | सम्भवनाथः |
| 4 | अभिनन्दननाथः |
| 5 | सुमतिनाथः |
| 6 | पद्मप्रभः |
| 7 | सुपार्श्वनाथः |
| 8 | चन्द्रप्रभः |
| 9 | पुष्पदन्तः — सुविधिनाथः |
| 10 | शीतलनाथः |
| 11 | श्रेयांसनाथः |
| 12 | वासुपूज्यः |
| 13 | विमलनाथः |
| 14 | अनन्तनाथः |
| 15 | धर्मनाथः |
| 16 | शान्तिनाथः |
| 17 | कुन्थुनाथः |
| 18 | अरनाथः |
| 19 | मल्लिनाथः |
| 20 | मुनिसुव्रतः |
| 21 | नामिनाथः |
| 22 | नेमिनाथः — अरिष्टनेमिः |
| 23 | पार्श्वनाथः |
| 24 | महावीरः — वर्धमानः |
जैनधर्म के प्रमुख तीर्थस्थान
| क्रम | तीर्थस्थान | राज्य / स्थान |
|---|---|---|
| 1 | सम्मेतशिखरम् / पारसनाथ पर्वत | झारखण्ड |
| 2 | श्रवणबेलगोळ | कर्नाटक |
| 3 | पावापुरी | बिहार |
| 4 | रैवतक / गिरनार पर्वत | गुजरात |
| 5 | शत्रुञ्जय पर्वत / पालीताणा | गुजरात |
| 6 | राजगृह | बिहार |
| 7 | अयोध्या | उत्तर प्रदेश |
| 8 | काशी / वाराणसी | उत्तर प्रदेश |
| 9 | चम्पापुर | भागलपुर, बिहार |
| 10 | हस्तिनापुर | उत्तर प्रदेश |
| 11 | मिथिला | बिहार |
| 12 | द्वारिका | गुजरात |
अभ्यास 1 — एकपदेन उत्तरं लिखत
अभ्यास 2 — पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत
अभ्यास 3 — समस्तपदानि लिखत
| विग्रहवाक्यम् | समस्तपदम् |
|---|---|
| महान् च असौ राजा च | महाराजः |
| प्रजानां सुखम् | प्रजासुखम् |
| मूलाः समस्याः | मूलसमस्याः |
| भोजनस्य निर्माणम् | भोजननिर्माणम् |
| आर्थिकी स्थितिः | आर्थिकस्थितिः |
| प्राप्तः आनन्दः येन सः | प्राप्तानन्दः |
| विधिना लिखितम् | विधिलिखितम् |
| गृहं गृहं प्रति | प्रतिगृहम् |
| ब्राह्मी नाम्नी लिपिः | ब्राह्मीलिपिः |
अभ्यास 4 — वाक्यपरिवर्तनम्
यहाँ कर्मप्रधान वाक्यों को कर्तृप्रधान रूप में बदला गया है।
| दत्तवाक्यम् | परिवर्तित वाक्यम् |
|---|---|
| महाराजेन राज्यं समर्पितम्। | महाराजः राज्यं समर्पितवान्। |
| केनापि तत् न चिन्तितम्। | कोऽपि तत् न चिन्तितवान्। |
| ऋषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः। | ऋषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासं कृतवान्। |
| जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता। | जनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः। |
| ऋषभेण योजना कृता। | ऋषभः योजनां कृतवान्। |
अभ्यास 5 — सन्धिं कुरुत
| पदानि | सन्धिरूपम् | सन्धिः |
|---|---|---|
| इति + अतः | इत्यतः | यण्-सन्धिः |
| च + इति | चेति | गुण-सन्धिः |
| देवस्य + अपि | देवस्यापि | सवर्णदीर्घ-सन्धिः |
| तथा + एव | तथैव | वृद्धि-सन्धिः |
| इति + एतादृशाः | इत्येतादृशाः | यण्-सन्धिः |
| ब्राह्मीद्वारा + एव | ब्राह्मीद्वारैव | वृद्धि-सन्धिः |
| प्रस्थितः + अयम् | प्रस्थितोऽयम् | विसर्ग-सन्धिः |
