णमो अरिहन्ताणम् Class 9 Notes and Answers

शारदा • कक्षा 9 • दशमः पाठः

णमो अरिहन्ताणम् (Salutations to the Arihantas)

यह पाठ ऋषभदेव के राजा से समाज-सुधारक, त्यागी साधक और जैन परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर आदिनाथ बनने की प्रेरक यात्रा को सरल संस्कृत कथा के माध्यम से प्रस्तुत करता है।

राजकुमार नाभि का पुत्र राजा समाज-सुधार त्याग साम्राज्य का परित्याग तपस्या ध्यान और उपवास केवलज्ञान आदिनाथ • प्रथम तीर्थङ्कर

परिचय

कथा के आरम्भ में नाभि नामक एक प्रसिद्ध राजा का वर्णन है। वे राजनीति, युद्धनीति और प्रशासन में समर्थ थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और करुणाशालिनी थीं।

उनके प्रिय पुत्र ऋषभ शिक्षित, गुणसम्पन्न और राजनीति के ज्ञाता थे। युवावस्था में उनके गुणों को देखकर राजा नाभि ने उन्हें राज्य का भार सौंपने का विचार किया।

Imp: ऋषभदेव की कथा केवल आध्यात्मिक जीवन की कहानी नहीं है। पाठ पहले उन्हें एक जिम्मेदार राजा और समाज-सुधारक के रूप में प्रस्तुत करता है।

कथा — ऋषभदेव की जीवन-यात्रा

1. राज्य में संकट

एक समय समाज में दुर्भिक्ष, पारस्परिक विद्वेष और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं। राजा नाभि ने इसे ऋषभ की राजनीतिक क्षमता की परीक्षा का उचित समय माना और राज्य उन्हें सौंप दिया।

राजा बनने के बाद ऋषभ ने तुरन्त समस्याओं के मूल कारणों को समझने का प्रयास किया। उन्होंने पाया कि जनता में आलस्य, कृषिकार्य की कमी और उत्पादन-क्षमता का अभाव मुख्य समस्याएँ थीं।

English Explanation: Rishabha does not treat famine only as a shortage of food. He studies the deeper causes—low productivity, lack of useful skills and insufficient participation in agriculture.

2. ऋषभदेव बने समाज-सुधारक

ऋषभ ने लोगों को केवल सहायता देने के बजाय उन्हें जीवनोपयोगी कौशल सिखाने का निर्णय लिया।

कृषिकार्यम् — खेती करना और उत्पादन बढ़ाना।
भोजननिर्माणम् — विभिन्न पदार्थों से भोजन बनाना।
वस्त्रनिर्माणम् — तन्तुओं से कपड़े बनाना।
पशुपालनम् — गाय, घोड़े आदि पशुओं की देखभाल।
शिल्पकौशलम् — लकड़ी, धातु और पत्थर से उपयोगी वस्तुएँ बनाना।
गृह एवं नगर निर्माण — मकानों, पात्रों और नगरों का निर्माण करना।

इन कौशलों के कारण लोग सक्रिय और स्वावलम्बी बने। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी और राज्य फिर से समृद्ध हुआ।

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥
English Explanation: A ruler's true happiness lies in the happiness of the people. What benefits the citizens should be more important than the ruler's personal likes and comforts.

3. विनिता नगर और सुशासन

ऋषभ ने समाज में फिर से शान्ति, सुरक्षा और न्यायिक व्यवस्था स्थापित की। उनके कुशल शासन से विनिता नामक नगर विकसित हुआ।

जनता उनके शासन और समाज-कल्याण से प्रभावित होकर उन्हें प्रेमपूर्वक राजा ऋषभदेव कहने लगी।

उनका साम्राज्य भी विस्तृत हुआ। उनके पुत्रों में भरत और बाहुबली विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। उनकी पुत्रियाँ ब्राह्मी और सुन्दरी भी शास्त्रों में निपुण थीं।

Imp: पाठ में जैन परम्परा के अनुसार ब्राह्मी को ब्राह्मी लिपि के विकास से जोड़ा गया है।

4. जीवन बदल देने वाली घटना

ऋषभदेव राजमहल में अत्यन्त सुखी जीवन बिता रहे थे। एक दिन महल में नृत्य-प्रदर्शन आयोजित हुआ। नृत्य करती हुई एक स्वस्थ नर्तकी अचानक भूमि पर गिरकर मर गयी।

इस घटना ने ऋषभदेव को भीतर से विचलित कर दिया। उनके मन में अनेक प्रश्न उठे— जीवन क्या है? मृत्यु इतनी अचानक कैसे आ सकती है? क्या संसार का सुख स्थायी है?

दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्।
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥
English Explanation: The sudden death makes Rishabhadeva realize that worldly conditions are temporary. This becomes the turning point from royal life towards the search for lasting truth.

5. साम्राज्य का त्याग

ऋषभदेव ने विचार किया कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। स्थिर और वास्तविक सुख की खोज के लिए उन्होंने राजवैभव छोड़ने का निर्णय लिया।

उन्होंने विशाल साम्राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। विनिता राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबली को दी गयी।

इसके बाद वे भिक्षु के रूप में जीवन का परम सत्य खोजने निकल पड़े। अनेक लोग उनके शिष्य बनकर साथ चलने लगे।

राजवैभव → वैराग्य → त्याग → आत्मज्ञान की खोज

6. तपस्या और मौन साधना

ऋषभदेव जंगलों में मौन रहकर ध्यान और निरन्तर अध्ययन करते थे। वे साधना में इतने लीन रहते कि भोजन-पान तक भूल जाते।

उनके अनुयायी भी उनके साथ रहते थे, पर उनके लिए इतना कठोर उपवास कठिन था। इसलिए वे जंगल से फल और शाक लेकर जीवन बिताने लगे।

ऋषभदेव ने समझाया कि जैन संन्यासी वृक्षों से स्वयं फल-शाक तोड़कर न लें। उन्होंने स्वयं भिक्षा माँगकर उदाहरण प्रस्तुत किया।

7. भिक्षा की कठिनाई

ऋषभदेव मौन होकर घर-घर भिक्षा के लिए जाते थे। लेकिन लोग अपने पूर्व महाराज को देखकर यह नहीं समझते थे कि उन्हें भिक्षा में भोजन देना चाहिए।

लोग उन्हें आभूषण और बहुमूल्य वस्तुएँ देते थे। ऋषभदेव इन्हें स्वीकार नहीं करते थे क्योंकि उन्हें भोजन की आवश्यकता थी।

इस कारण उनका उपवास बहुत लम्बा हो गया। पाठ में बताया गया है कि उन्होंने निरन्तर चार सौ दिनों तक उपवास किया।

8. श्रेयांस द्वारा इक्षुरस का दान

एक दिन ऋषभदेव हस्तिनापुर के पास एक गन्ने के खेत के निकट पहुँचे। वह खेत उनके प्रपौत्र श्रेयांस का था।

श्रेयांस ने अपने प्रपितामह को पीने के लिए इक्षुरस — गन्ने का रस दिया। इससे ऋषभदेव का दीर्घ उपवास समाप्त हुआ।

वह दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया था। इसी प्रसंग से पाठ जैन परम्परा में वर्षीतप-पारणा की परम्परा को जोड़ता है।

English Explanation: Shreyansa finally understands what the ascetic needs and offers sugarcane juice. The act ends Rishabhadeva's long fast and becomes an important event in the tradition described in the chapter.

9. केवलज्ञान की प्राप्ति

दीर्घ तप, निरन्तर अध्ययन और साधना के बाद ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया।

वे जैन परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर माने गये और आदिनाथ नाम से प्रसिद्ध हुए।

Imp: “आदिनाथ” का अर्थ यहाँ प्रथम मार्गदर्शक अथवा प्रथम तीर्थङ्कर के रूप में ऋषभदेव की प्रतिष्ठा से जुड़ा है।

10. जैन सङ्घ की व्यवस्था

जनसमाज के मार्गदर्शन के लिए ऋषभदेव ने चार भागों की व्यवस्था बतायी—

क्रमवर्गसरल अर्थ
1भिक्षुःसंन्यासी पुरुष
2भिक्षुणीसंन्यासिनी
3श्रावकःगृहस्थ पुरुष अनुयायी
4श्राविकागृहस्थ महिला अनुयायी

इन चारों से बना क्रम पाठ में जैन सङ्घ कहलाता है।

णमोकार / नवकार महामन्त्र

पाठ में जैन परम्परा का प्रसिद्ध नवकार मन्त्र प्राकृत भाषा में दिया गया है।

णमो अरिहन्ताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
प्राकृत पदसंस्कृत अर्थसरल हिन्दी अर्थ
णमो अरिहन्ताणंनमामि अरिहन्तान्अरिहन्तों को नमस्कार
णमो सिद्धाणंनमामि सिद्धान्सिद्धों को नमस्कार
णमो आयरियाणंनमामि आचार्यान्आचार्यों को नमस्कार
णमो उवज्झायाणंनमामि उपाध्यायान्उपाध्यायों को नमस्कार
णमो लोए सव्वसाहूणंनमामि लोके सर्वसाधून्संसार के सभी साधुओं को नमस्कार
English Explanation: The mantra is a salutation to spiritually respected beings and teachers: Arihantas, Siddhas, Acharyas, Upadhyayas and all Sadhus. The focus is reverence towards spiritual qualities rather than a request for material benefit.

जैनमत के प्रमुख सिद्धान्त

1. अहिंसा

मन, वाणी और कर्म से किसी जीव को हिंसा न पहुँचाना।

अहिंसा परमो धर्मः

2. अनेकान्तवादः

सत्य के अनेक पक्ष हो सकते हैं। किसी विषय को केवल एक दृष्टिकोण से देखना पर्याप्त नहीं हो सकता।

3. स्याद्वादः

कथनों को परिस्थिति और दृष्टिकोण के सापेक्ष समझने की पद्धति।

4. अपरिग्रहः

आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।

English Explanation: The lesson presents Jain thought as encouraging non-violence, openness to different viewpoints, careful expression of truth and freedom from excessive possession.

जैन दर्शन के तीन रत्न

सम्यग्दर्शनम्
सत्य और धर्म के प्रति उचित दृष्टि।
सम्यग्ज्ञानम्
सही और यथार्थ ज्ञान।
सम्यक्चरित्रम्
ज्ञान के अनुसार उचित आचरण।
सम्यग्दर्शनम् → सम्यग्ज्ञानम् → सम्यक्चरित्रम्

पञ्चमहाव्रतानि

व्रतम्सरल अर्थ
सत्यम्सत्य बोलना और सत्य का पालन करना।
अहिंसाजीवों को मन, वचन और कर्म से हानि न पहुँचाना।
अस्तेयम्जो वस्तु अपनी नहीं है उसे न लेना।
अपरिग्रहःआवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।
ब्रह्मचर्यम्संयमित एवं अनुशासित जीवन जीना।

प्राकृत भाषा का परिचय

भारत की भाषा-परम्परा अत्यन्त समृद्ध रही है। एक समय अनेक प्राकृत भाषाएँ सामान्य लोगों के संवाद की भाषाएँ थीं।

प्राकृत का प्रकारपाठ में दिया गया सन्दर्भ
आर्षप्राकृतम्प्राकृत की एक प्राचीन परम्परा
मागधीप्राकृतम्प्रमुख प्राकृत रूप
शौरसेनीप्राकृतम्अनेक नाट्यग्रन्थों में प्रयुक्त
महाराष्ट्रप्राकृतम्महाकवि हाल की गाथासप्तशती से सम्बद्ध
पैशाचीप्राकृतम्प्राकृत का एक रूप
चूलिकाप्राकृतम्प्राकृत परम्परा का एक प्रकार
अपभ्रंशप्राकृतम्उत्तरवर्ती प्राकृत रूप

पाठ के अनुसार जैन आगम अर्धमागधी में लिखे गये। महाराष्ट्री प्राकृत में महाकवि हाल ने गाथासप्तशती की रचना की और शौरसेनी प्राकृत का उपयोग अनेक नाट्यग्रन्थों में हुआ।

English Explanation: Prakrit languages were not merely casual spoken forms. The chapter presents them as important vehicles of literature, religious texts and drama, closely related to Sanskrit.
Imp: पाठ की सुन्दर उपमा है — यदि संस्कृत एक स्रोतस्विनी नदी है, तो प्राकृत उसी का सरल प्रवाह है।

जैनधर्म के 24 तीर्थङ्कर

पाठ के स्वाध्याय भाग में जैन परम्परा के चौबीस तीर्थङ्करों के नाम दिये गये हैं।

क्रमतीर्थङ्कर
1ऋषभदेवः — आदिनाथः
2अजितनाथः
3सम्भवनाथः
4अभिनन्दननाथः
5सुमतिनाथः
6पद्मप्रभः
7सुपार्श्वनाथः
8चन्द्रप्रभः
9पुष्पदन्तः — सुविधिनाथः
10शीतलनाथः
11श्रेयांसनाथः
12वासुपूज्यः
13विमलनाथः
14अनन्तनाथः
15धर्मनाथः
16शान्तिनाथः
17कुन्थुनाथः
18अरनाथः
19मल्लिनाथः
20मुनिसुव्रतः
21नामिनाथः
22नेमिनाथः — अरिष्टनेमिः
23पार्श्वनाथः
24महावीरः — वर्धमानः
ऋषभदेवः: प्रथम तीर्थङ्कर, “आदिनाथ” नाम से प्रसिद्ध।
महावीरः: चौबीसवें तीर्थङ्कर। पाठ में अहिंसा, अपरिग्रह और संयम के उपदेशक के रूप में उल्लेखित हैं।

जैनधर्म के प्रमुख तीर्थस्थान

क्रमतीर्थस्थानराज्य / स्थान
1सम्मेतशिखरम् / पारसनाथ पर्वतझारखण्ड
2श्रवणबेलगोळकर्नाटक
3पावापुरीबिहार
4रैवतक / गिरनार पर्वतगुजरात
5शत्रुञ्जय पर्वत / पालीताणागुजरात
6राजगृहबिहार
7अयोध्याउत्तर प्रदेश
8काशी / वाराणसीउत्तर प्रदेश
9चम्पापुरभागलपुर, बिहार
10हस्तिनापुरउत्तर प्रदेश
11मिथिलाबिहार
12द्वारिकागुजरात

अभ्यास 1 — एकपदेन उत्तरं लिखत

(क) ऋषभेण निर्मितस्य नगरस्य नाम किम्?
विनिता।
(ख) ऋषभस्य प्रसिद्धे द्वे कन्ये के?
ब्राह्मी, सुन्दरी।
(ग) कस्यां लिप्यां नैकानि शास्त्राणि लिपिबद्धानि?
ब्राह्मीलिप्याम्।
(घ) विनिता नामकं राज्यं ऋषभः कस्मै समर्पितवान्?
भरताय।
(ङ) ऋषभः बाहुबलिने किं राज्यं प्रदत्तवान्?
तक्षशिलाम्।
(च) प्रजाः भिक्षायां कानि वस्तूनि यच्छन्ति स्म?
आभरणानि अनर्घवस्तूनि च।

अभ्यास 2 — पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत

(क) देशे काः समस्याः सन्ति इति ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता?
देशे जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता तथा उत्पादनक्षमतायाः अभावः इत्यादयः मूलसमस्याः सन्ति इति ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता।
(ख) महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्?
महाराजः कृषिकार्ये, भोजननिर्माणे, वस्त्रनिर्माणे, पशुपालने, गृहयोग्यवस्तुनिर्माणे, पात्रनिर्माणे, गृहनिर्माणे तथा नगरनिर्माणे प्रजाः प्रशिक्षितवान्।
(ग) ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत्?
राजप्रासादे नृत्यं प्रदर्शयन्त्याः नर्तक्याः सहसा पतित्वा मृत्युः ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना आसीत्।
(घ) ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथम् अभवत्?
श्रेयांसेन पानार्थम् इक्षुरसं प्रदत्ते ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः अभवत्।
(ङ) ऋषभदेवः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान्?
ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।
(च) जनानां मार्गदर्शनार्थं कं क्रमं रचितवान्?
जनानां मार्गदर्शनार्थं ऋषभदेवः भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका चेति क्रमं रचितवान्।

अभ्यास 3 — समस्तपदानि लिखत

विग्रहवाक्यम्समस्तपदम्
महान् च असौ राजा चमहाराजः
प्रजानां सुखम्प्रजासुखम्
मूलाः समस्याःमूलसमस्याः
भोजनस्य निर्माणम्भोजननिर्माणम्
आर्थिकी स्थितिःआर्थिकस्थितिः
प्राप्तः आनन्दः येन सःप्राप्तानन्दः
विधिना लिखितम्विधिलिखितम्
गृहं गृहं प्रतिप्रतिगृहम्
ब्राह्मी नाम्नी लिपिःब्राह्मीलिपिः

अभ्यास 4 — वाक्यपरिवर्तनम्

यहाँ कर्मप्रधान वाक्यों को कर्तृप्रधान रूप में बदला गया है।

दत्तवाक्यम्परिवर्तित वाक्यम्
महाराजेन राज्यं समर्पितम्।महाराजः राज्यं समर्पितवान्।
केनापि तत् न चिन्तितम्।कोऽपि तत् न चिन्तितवान्।
ऋषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः।ऋषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासं कृतवान्।
जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता।जनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः।
ऋषभेण योजना कृता।ऋषभः योजनां कृतवान्।

अभ्यास 5 — सन्धिं कुरुत

पदानिसन्धिरूपम्सन्धिः
इति + अतःइत्यतःयण्-सन्धिः
च + इतिचेतिगुण-सन्धिः
देवस्य + अपिदेवस्यापिसवर्णदीर्घ-सन्धिः
तथा + एवतथैववृद्धि-सन्धिः
इति + एतादृशाःइत्येतादृशाःयण्-सन्धिः
ब्राह्मीद्वारा + एवब्राह्मीद्वारैववृद्धि-सन्धिः
प्रस्थितः + अयम्प्रस्थितोऽयम्विसर्ग-सन्धिः

Imp Questions and Answers

1. ऋषभदेव ने राज्य की समस्याओं को कैसे दूर किया?
उन्होंने समस्याओं के मूल कारण खोजे और लोगों को खेती, भोजन निर्माण, वस्त्र निर्माण, पशुपालन तथा अन्य जीवनोपयोगी कौशल सिखाये। इससे लोग स्वावलम्बी बने और राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरी।
2. ऋषभदेव को आदर्श राजा क्यों कहा जा सकता है?
क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत सुख की अपेक्षा प्रजा के सुख और हित को अधिक महत्त्व दिया तथा शान्ति, सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था स्थापित की।
3. ऋषभदेव के जीवन में वैराग्य कैसे उत्पन्न हुआ?
राजप्रासाद में एक स्वस्थ नर्तकी की अचानक मृत्यु देखकर उन्हें जीवन की अस्थिरता का अनुभव हुआ। इस घटना ने उन्हें स्थायी सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया।
4. ऋषभदेव ने राज्य किस प्रकार बाँटा?
उन्होंने अपना विशाल साम्राज्य पुत्रों में विभाजित किया। विनिता राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबली को दी।
5. ऋषभदेव का लम्बा उपवास क्यों हुआ?
लोग उन्हें पूर्व राजा के रूप में पहचानते थे और भिक्षा में भोजन देने के स्थान पर आभूषण तथा मूल्यवान वस्तुएँ देते थे। इसलिए उन्हें भोजन नहीं मिला और उपवास लम्बा होता गया।
6. अक्षय तृतीया का इस कथा में क्या महत्व है?
इसी दिन श्रेयांस ने ऋषभदेव को इक्षुरस दिया और उनका दीर्घ उपवास समाप्त हुआ। पाठ इस घटना को जैन परम्परा के वर्षीतप-पारणा से जोड़ता है।
7. ऋषभदेव को आदिनाथ क्यों कहा गया?
जैन परम्परा में उन्हें प्रथम तीर्थङ्कर माना गया है, इसलिए वे “आदिनाथ” नाम से प्रसिद्ध हुए।
8. नवकार मन्त्र किनको नमस्कार करता है?
नवकार मन्त्र अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा संसार के सभी साधुओं को नमस्कार करता है।
9. अनेकान्तवाद का सरल अर्थ क्या है?
अनेकान्तवाद के अनुसार सत्य के अनेक पक्ष हो सकते हैं। किसी विषय को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझना चाहिए।
10. अपरिग्रह का क्या अर्थ है?
आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना अपरिग्रह कहलाता है।
11. जैन दर्शन के तीन रत्न कौन-से हैं?
सम्यग्दर्शनम्, सम्यग्ज्ञानम् और सम्यक्चरित्रम्।
12. पञ्चमहाव्रत कौन-कौन से हैं?
सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः और ब्रह्मचर्यम्।

Important Lines — English Explanation

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
Meaning: A good ruler finds his own happiness in the happiness and welfare of the people.
अहिंसा परमो धर्मः।
Meaning: Non-violence is presented as a supreme ethical principle. It includes restraint in thought, speech and action.
णमो अरिहन्ताणं।
Meaning: “I bow to the Arihantas.” The opening line gives the chapter its title.
Imp: ऋषभदेव की कथा में तीन स्पष्ट चरण दिखाई देते हैं — समाज की सेवा, संसार की अस्थिरता का बोध, और आत्मज्ञान की खोज।