संस्कृत में क्रिया का रूप धातु, पुरुष, वचन, पद तथा
लकार के अनुसार बदलता है। इस परिशिष्ट में पठ् धातु के
परस्मैपदी रूप, णिच्-प्रत्यय से प्रेरणार्थक रूप,
आत्मनेपदी वृध् और लभ् धातु तथा विशेष शीङ् और भुज् धातुओं के
रूप समझाये गये हैं।
संस्कृत में क्रिया का मूल रूप धातु कहलाता है।
उदाहरण के लिए पठ् का मूल अर्थ पढ़ना है।
यही धातु जब अलग-अलग पुरुष, वचन और काल में प्रयुक्त होती है,
तब उसके रूप बदलते हैं—
पठ्
→
पठति
→
पठतः
→
पठन्ति
English Explanation:
A Sanskrit verbal root is called a dhātu.
The root changes its visible form according to person, number,
tense or mood, and whether it follows Parasmaipada or Atmanepada endings.
Imp for Exams:
धातुरूप लिखते समय चार बातें अवश्य पहचानें—
धातु + लकार + पुरुष + वचन।
Concept Story — पठ् धातु की यात्रा
1. एक छात्र पढ़ता है
एक छात्र पढ़ रहा है। हम कहते हैं—
छात्रः पठति।
यहाँ वर्तमानकाल है, इसलिए लट्-लकार का प्रयोग हुआ।
2. दो छात्र पढ़ते हैं
संस्कृत में दो व्यक्तियों के लिए अलग द्विवचन होता है—
छात्रौ पठतः।
3. बहुत से छात्र पढ़ते हैं
बहुवचन में—
छात्राः पठन्ति।
4. शिक्षक किसी को पढ़वाता है
अब अर्थ केवल “पढ़ता है” नहीं बल्कि “पढ़वाता है” हो जाता है।
प्रेरणार्थक अर्थ के लिए णिच्-प्रत्यय से—
पठ् → पाठयति।
पुरुष और वचन
पुरुषः
सामान्य कर्ता
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुषः
सः / तौ / ते आदि
एक व्यक्ति
दो व्यक्ति
अनेक व्यक्ति
मध्यमपुरुषः
त्वम् / युवाम् / यूयम्
तुम
तुम दोनों
तुम सब
उत्तमपुरुषः
अहम् / आवाम् / वयम्
मैं
हम दोनों
हम सब
Imp:
संस्कृत का प्रथमपुरुष English grammar के “third person”
के समान है, जबकि उत्तमपुरुष “I / We” के लिए आता है।
इस परिशिष्ट में प्रयुक्त पाँच लकार
लकारः
मुख्य अर्थ
पठ् का उदाहरण
लट्
वर्तमानकाल
पठति
लृट्
भविष्यत्काल
पठिष्यति
लङ्
भूतकाल
अपठत्
लोट्
आज्ञा / प्रेरणा
पठतु
विधिलिङ्
विधि / सम्भावना / चाहिए
पठेत्
णिच्-प्रत्यय — प्रेरणार्थक प्रयोग
जब कर्ता स्वयं कार्य नहीं करता बल्कि किसी दूसरे से कार्य करवाता है,
तब प्रेरणार्थक अर्थ प्रकट होता है।
English Explanation:
The causative expresses “to make or cause someone to do something”.
Thus पठति means “he reads”, while पाठयति means
“he teaches / makes someone read”.
परस्मैपदी पठ् धातु — पाँच लकार
1. लट्-लकार — Present Tense
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
पठति
पठतः
पठन्ति
मध्यम
पठसि
पठथः
पठथ
उत्तम
पठामि
पठावः
पठामः
2. लृट्-लकार — Future Tense
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
पठिष्यति
पठिष्यतः
पठिष्यन्ति
मध्यम
पठिष्यसि
पठिष्यथः
पठिष्यथ
उत्तम
पठिष्यामि
पठिष्यावः
पठिष्यामः
3. लङ्-लकार — Past Tense
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
अपठत्
अपठताम्
अपठन्
मध्यम
अपठः
अपठतम्
अपठत
उत्तम
अपठम्
अपठाव
अपठाम
Imp:
लङ्-लकार में प्रायः धातु के पहले अ- आगम दिखाई देता है—
पठति → अपठत्।
4. लोट्-लकार — Imperative
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
पठतु / पठतात्
पठताम्
पठन्तु
मध्यम
पठ / पठतात्
पठतम्
पठत
उत्तम
पठानि
पठाव
पठाम
5. विधिलिङ् — Potential / Optative
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
पठेत्
पठेताम्
पठेयुः
मध्यम
पठेः
पठेतम्
पठेत
उत्तम
पठेयम्
पठेव
पठेम
आत्मनेपदी धातवः
परिशिष्ट में आत्मनेपदी धातुओं के रूप समझाने के लिए
वृध् और लभ् को प्रमुख उदाहरण बनाया गया है।
वृध्
→
वर्धते
लभ्
→
लभते
पाठ में इसी प्रकार के अन्य आत्मनेपदी प्रयोगों में
भाषते, वर्तते, कम्पते, स्पर्धते, सेवते, स्पन्दते,
यतते, रोचते, एधते, मोदते, वन्दते, रमते, शोभते,
सहते, ईक्षते और शिक्षते आदि दिये गये हैं।
वृध् धातु — लट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
वर्धते
वर्धेते
वर्धन्ते
मध्यम
वर्धसे
वर्धेथे
वर्धध्वे
उत्तम
वर्धे
वर्धावहे
वर्धामहे
वाक्येषु प्रयोगः
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
वृक्षः वर्धते।
वृक्षौ वर्धेते।
वृक्षाः वर्धन्ते।
मध्यम
त्वं वर्धसे।
युवां वर्धेथे।
यूयं वर्धध्वे।
उत्तम
अहं वर्धे।
आवां वर्धावहे।
वयं वर्धामहे।
लभ् धातु — लट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
लभते
लभेते
लभन्ते
मध्यम
लभसे
लभेथे
लभध्वे
उत्तम
लभे
लभावहे
लभामहे
आत्मनेपदी धातु — लृट्-लकार
वृध् — Future
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
वर्धिष्यते
वर्धिष्येते
वर्धिष्यन्ते
मध्यम
वर्धिष्यसे
वर्धिष्येथे
वर्धिष्यध्वे
उत्तम
वर्धिष्ये
वर्धिष्यावहे
वर्धिष्यामहे
लभ् — Future
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
लप्स्यते
लप्स्येते
लप्स्यन्ते
मध्यम
लप्स्यसे
लप्स्येथे
लप्स्यध्वे
उत्तम
लप्स्ये
लप्स्यावहे
लप्स्यामहे
Imp:
लभ् धातु का भविष्यत्काल सीधे “लभिष्यते” नहीं,
बल्कि पाठ में लप्स्यते दिया गया है।
आत्मनेपदी धातु — लङ्-लकार
वृध्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
अवर्धत
अवर्धेताम्
अवर्धन्त
मध्यम
अवर्धथाः
अवर्धेथाम्
अवर्धध्वम्
उत्तम
अवर्धे
अवर्धावहि
अवर्धामहि
लभ्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
अलभत
अलभेताम्
अलभन्त
मध्यम
अलभथाः
अलभेथाम्
अलभध्वम्
उत्तम
अलभे
अलभावहि
अलभामहि
आत्मनेपदी धातु — लोट्-लकार
वृध्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
वर्धताम्
वर्धेताम्
वर्धन्ताम्
मध्यम
वर्धस्व
वर्धेथाम्
वर्धध्वम्
उत्तम
वर्धै
वर्धावहै
वर्धामहै
लभ्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
लभताम्
लभेताम्
लभन्ताम्
मध्यम
लभस्व
लभेथाम्
लभध्वम्
उत्तम
लभै
लभावहै
लभामहै
आत्मनेपदी धातु — विधिलिङ्
वृध्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
वर्धेत
वर्धेयाताम्
वर्धेरन्
मध्यम
वर्धेथाः
वर्धेयाथाम्
वर्धेध्वम्
उत्तम
वर्धेय
वर्धेवहि
वर्धेमहि
लभ्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
लभेत
लभेयाताम्
लभेरन्
मध्यम
लभेथाः
लभेयाथाम्
लभेध्वम्
उत्तम
लभेय
लभेवहि
लभेमहि
परस्मैपद और आत्मनेपद — रूपों का अन्तर
आधार
परस्मैपदम्
आत्मनेपदम्
लट् प्रथम एकवचन
पठति
वर्धते / लभते
लट् मध्यम एकवचन
पठसि
वर्धसे / लभसे
लट् उत्तम एकवचन
पठामि
वर्धे / लभे
बहुवचन संकेत
-न्ति, -थ, -मः
-न्ते, -ध्वे, -महे
English Explanation:
Parasmaipada and Atmanepada use different personal endings.
Compare पठति with वर्धते, पठसि with वर्धसे, and पठामि with वर्धे.
विशिष्ट आत्मनेपदी धातु — शीङ्
शीङ् धातु का अर्थ सोना / लेटना है।
इसके रूप सामान्य वृध्-लभ् pattern से कुछ अलग दिखाई देते हैं।
लट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
शेते
शयाते
शेरते
मध्यम
शेषे
शयाथे
शेध्वे
उत्तम
शये
शेवहे
शेमहे
लृट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
शयिष्यते
शयिष्येते
शयिष्यन्ते
मध्यम
शयिष्यसे
शयिष्येथे
शयिष्यध्वे
उत्तम
शयिष्ये
शयिष्यावहे
शयिष्यामहे
लङ्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
अशेत
अशयाताम्
अशेरत
मध्यम
अशेथाः
अशयाथाम्
अशेध्वम्
उत्तम
अशयि
अशेवहि
अशेमहि
लोट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
शेताम्
शयाताम्
शेरताम्
मध्यम
शेष्व
शयाथाम्
शेध्वम्
उत्तम
शयै
शयावहै
शयामहै
विधिलिङ्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
शयीत
शयीयाताम्
शयीरन्
मध्यम
शयीथाः
शयीयाथाम्
शयीध्वम्
उत्तम
शयीय
शयीवहि
शयीमहि
Imp for Exams:
शीङ् धातु में शे- और शय- दोनों प्रकार के रूप दिखाई देते हैं।
इसलिए इसे सामान्य आत्मनेपदी धातु की तरह mechanically न लिखें।
विशिष्ट आत्मनेपदी धातु — भुज्
भुज् धातु के रूपों में ध्वनि-परिवर्तन विशेष रूप से दिखाई देता है—
भुङ्क्ते, भुञ्जाते, भोक्ष्यते आदि।
लट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
भुङ्क्ते
भुञ्जाते
भुञ्जते
मध्यम
भुङ्क्षे
भुञ्जाथे
भुङ्ग्ध्वे
उत्तम
भुञ्जे
भुञ्ज्वहे
भुञ्ज्महे
लृट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
भोक्ष्यते
भोक्ष्येते
भोक्ष्यन्ते
मध्यम
भोक्ष्यसे
भोक्ष्येथे
भोक्ष्यध्वे
उत्तम
भोक्ष्ये
भोक्ष्यावहे
भोक्ष्यामहे
लङ्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
अभुङ्क्त
अभुञ्जाताम्
अभुञ्जत
मध्यम
अभुङ्क्थाः
अभुञ्जाथाम्
अभुङ्ग्ध्वम्
उत्तम
अभुञ्जि
अभुञ्ज्वहि
अभुञ्ज्महि
लोट्-लकार
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
भुङ्क्ताम्
भुञ्जाताम्
भुञ्जताम्
मध्यम
भुङ्क्ष्व
भुञ्जाथाम्
भुङ्ग्ध्वम्
उत्तम
भुञ्जै
भुञ्जावहै
भुञ्जामहै
विधिलिङ्
पुरुषः
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
भुञ्जीत
भुञ्जीयाताम्
भुञ्जीरन्
मध्यम
भुञ्जीथाः
भुञ्जीयाथाम्
भुञ्जीध्वम्
उत्तम
भुञ्जीय
भुञ्जीवहि
भुञ्जीमहि
रूप पहचानने के Imp Patterns
1. लट् परस्मैपद
प्रथमपुरुष में -ति, -तः, -न्ति का pattern पठ् धातु में स्पष्ट है।
2. लट् आत्मनेपद
प्रथमपुरुष में सामान्यतः
-ते, -ेते, -न्ते जैसे रूप दिखाई देते हैं—
वर्धते, वर्धेते, वर्धन्ते।
3. भविष्यत्काल
पठ् में पठिष्य-,
वृध् में वर्धिष्य-,
शीङ् में शयिष्य-
तथा भुज् में भोक्ष्य- आधार दिखाई देता है।
4. लङ्-लकार
भूतकाल के अनेक रूपों में आरम्भ में
अ- जुड़ता है—
अपठत्, अवर्धत, अलभत, अशेत, अभुङ्क्त।
धातुरूप प्रश्न कैसे हल करें?
Step 1: धातु पहचानें — पठ्, वृध्, लभ्, शीङ् या भुज्।
Step 2: देखें कि धातु परस्मैपदी है या आत्मनेपदी।
Step 3: लकार पहचानें—
लट्, लृट्, लङ्, लोट् या विधिलिङ्।
Step 4: पुरुष और वचन की सही row-column चुनें।
धातुः
→
पदम्
→
लकारः
→
पुरुषः
→
वचनम्
→
सही रूप
Questions and Detailed Answers
इस परिशिष्ट में पृथक् क्रमांकित अभ्यास-प्रश्न नहीं दिये गये हैं।
इसलिए नीचे उसी पाठ की रूप-सारिणियों पर आधारित विस्तृत अध्ययन-प्रश्नोत्तर दिये गये हैं।
1. धातुः किम्?
क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं। जैसे “पठ्” पढ़ने की क्रिया का मूल है।
इसी धातु से पठति, पठतः, पठन्ति, पठिष्यति, अपठत् आदि अनेक रूप बनते हैं।
2. धातुरूप किन आधारों पर बदलता है?
धातुरूप मुख्यतः धातु, पद, लकार, पुरुष और वचन के अनुसार बदलता है।
इसलिए किसी रूप को बनाने से पहले इन सभी को पहचानना आवश्यक है।
3. पठ् धातु का लट् प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
पठति। द्विवचन में पठतः तथा बहुवचन में पठन्ति होता है।
4. णिच्-प्रत्यय का क्या अर्थ है?
णिच् का प्रयोग यहाँ प्रेरणार्थक अर्थ में किया गया है।
इससे किसी दूसरे से कार्य करवाने का भाव आता है।
जैसे पठति = पढ़ता है, जबकि पाठयति = पढ़वाता / पढ़ाता है।
5. पठ् + णिच् का प्रथमपुरुष बहुवचन क्या है?
पाठयन्ति।
इसी paradigm में एकवचन पाठयति और द्विवचन पाठयतः है।
6. पठ् धातु का लृट् प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
पठिष्यति। यह भविष्यत्काल का रूप है।
7. “अपठत्” किस लकार का रूप है?
“अपठत्” पठ् धातु का लङ्-लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन रूप है।
इसका सामान्य अर्थ “उसने पढ़ा / वह पढ़ता था” होता है।
8. “पठन्तु” का व्याकरणिक परिचय क्या है?
“पठन्तु” पठ् धातु का लोट्-लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन रूप है।
इसमें आज्ञा या प्रेरणा का अर्थ होता है।
9. “पठेत्” किस अर्थ में प्रयुक्त होता है?
“पठेत्” विधिलिङ् का प्रथमपुरुष एकवचन रूप है।
प्रसंग के अनुसार इसका अर्थ “पढ़ना चाहिए”, “पढ़े” या सम्भावना का भाव हो सकता है।
10. आत्मनेपदी वृध् धातु का लट् प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
वर्धते। द्विवचन वर्धेते और बहुवचन वर्धन्ते है।
11. वृध् धातु का वाक्य में प्रयोग कैसे होता है?
एकवचन में “वृक्षः वर्धते”,
द्विवचन में “वृक्षौ वर्धेते”
तथा बहुवचन में “वृक्षाः वर्धन्ते”।
इससे क्रिया और कर्ता के वचन का सम्बन्ध स्पष्ट होता है।
12. लभ् धातु का भविष्यत्काल प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
लप्स्यते।
यह विशेष रूप ध्यान रखने योग्य है।
13. वृध् धातु का लोट् मध्यमपुरुष एकवचन क्या है?
वर्धस्व।
इसका प्रयोग सामने वाले व्यक्ति के लिए आज्ञा अथवा प्रेरणा के अर्थ में हो सकता है।
14. लभ् धातु का विधिलिङ् प्रथमपुरुष बहुवचन क्या है?
लभेरन्।
एकवचन लभेत और द्विवचन लभेयाताम् है।
15. शीङ् धातु का वर्तमानकाल प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
शेते।
इसका द्विवचन शयाते और बहुवचन शेरते है।
16. शीङ् धातु का भविष्यत्काल रूप कैसे पहचाने?
भविष्यत्काल में इसका आधार शयिष्य- दिखाई देता है—
शयिष्यते, शयिष्येते, शयिष्यन्ते आदि।
17. भुज् धातु का लट् प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
भुङ्क्ते।
द्विवचन भुञ्जाते और बहुवचन भुञ्जते है।
18. भुज् धातु का भविष्यत्काल प्रथमपुरुष एकवचन क्या है?
भोक्ष्यते।
यहाँ मूल भुज् से भविष्यत्कालीन आधार “भोक्ष्य-” बनता है।
19. “अभुङ्क्त” किस रूप का उदाहरण है?
यह भुज् धातु का लङ्-लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन रूप है।
20. “भुञ्जीत” का परिचय क्या है?
“भुञ्जीत” भुज् धातु का विधिलिङ्, प्रथमपुरुष, एकवचन रूप है।
21. परस्मैपद और आत्मनेपद में सबसे सरल पहचान क्या है?
वर्तमानकाल के रूप देखकर अन्तर आसानी से समझा जा सकता है।
परस्मैपद में पठति, पठसि, पठामि जैसे endings मिलते हैं,
जबकि आत्मनेपद में वर्धते, वर्धसे, वर्धे जैसे endings मिलते हैं।
22. लङ्-लकार की एक सामान्य पहचान क्या है?
पाठ में दिये गये अनेक लङ् रूपों के आरम्भ में “अ-” दिखाई देता है—
अपठत्, अवर्धत, अलभत, अशेत तथा अभुङ्क्त।
4.
आत्मनेपद के लट् endings में
-ते, -से, -े जैसे रूपों को पहचानें।
5.
विशेष धातुओं को अलग याद करें—
शीङ् → शेते,
भुज् → भुङ्क्ते,
लभ् → लप्स्यते।
6.
केवल ending देखकर रूप न लिखें।
पहले धातु और उसका विशेष रूप देखें, विशेषकर
शीङ्, भुज् और लभ् जैसे शब्दों में।
Important Concepts — English Explanation
Dhātu
A dhātu is the basic verbal root from which conjugated forms are created.
For example, पठ् gives forms such as पठति, पठिष्यति and अपठत्.
Lakāra
A lakāra expresses tense or mood.
In this appendix the important forms are present, future, past,
imperative and potential.
Causative
The causative changes the meaning from doing an action to causing
another person to do it. Thus पठति means “reads”,
while पाठयति means “causes to read / teaches”.
Special Verb Patterns
Not every Sanskrit verb can be produced by attaching endings mechanically.
Special roots such as शीङ् and भुज् show important stem changes,
so their complete patterns should be learned carefully.
Imp for Exams:
Identify the root, pada, lakāra, person and number first.
Only then choose the correct verb form.