कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः (A Good Deed Should Be Repaid — This Is the Eternal Dharma)
महाभारत की प्रसिद्ध बकासुर-वध कथा पर आधारित यह संस्कृत रूपक उपकार, प्रत्युपकार, साहस, क्षत्रिय-धर्म और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की भावना को रोचक संवादों के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
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रामायण और महाभारत भारत के दो प्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ हैं। महाभारत की कथाओं के आधार पर अनेक संस्कृत रचनाएँ लिखी गयी हैं। यह पाठ विद्वान् श्री एन. रङ्गनाथशर्मा द्वारा रचित “एकचक्रम्” नामक लघुरूपक से लिया गया है।
इस रूपक की मुख्य कथावस्तु बकासुर-वध है। पाठ का यह भाग रूपक के तृतीय और चतुर्थ अङ्क से लिया गया है।
पूर्वकथा — एकचक्र नगर में पाण्डव
लाक्षागृह से बचने के बाद पाण्डव माता कुन्ती के साथ एकचक्र नगर में एक ब्राह्मण के घर निवास करते हैं।
नगर के निकट एक पर्वत पर बक नाम का शक्तिशाली राक्षस रहता है। नगरवासियों और बकासुर के बीच ऐसी व्यवस्था है कि प्रतिदिन भोजन से भरी गाड़ी के साथ एक मनुष्य भी उसके पास भेजा जाए।
जिस दिन की कथा इस पाठ में है, उस दिन उसी ब्राह्मण परिवार की बारी आती है जिसके घर पाण्डव रह रहे हैं। परिवार में केवल एक पुत्र होने के कारण सब अत्यन्त दुःखी हैं।
ब्राह्मण परिवार की अवस्था देखकर कुन्ती कहती हैं कि वह अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजेंगी।
भीम इसे उस ब्राह्मण द्वारा किये गये उपकार का प्रत्युपकार मानते हैं और स्वयं बकासुर के पास जाने का निर्णय लेते हैं।
कथा और संवाद
1. कुन्ती और भीम की बातचीत
कुन्ती बताती हैं कि अगली सुबह उस ब्राह्मण की बारी है। केवल भोजन भेजना पर्याप्त नहीं है; भोजन के साथ एक मनुष्य भी भेजना होता है।
कुन्ती मौन हो जाती हैं। भीम समझ जाते हैं कि यह दायित्व उन्हीं को पूरा करना है।
2. भीम का प्रत्युपकार-धर्म
भीम कहते हैं कि एक क्षत्रिय के लिए इसमें चिन्ता की कोई बात नहीं। जिस ब्राह्मण ने विपत्ति के समय पाण्डवों की सहायता की, उसका प्रत्युपकार किया जाना चाहिए।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥
भाव यह है कि पाण्डवों को नगरवासियों और ब्राह्मण परिवार से सहायता मिली थी। इसलिए अब सहायता लौटाने का अवसर आया है।
3. भोजन और युद्ध — दोनों का उत्साह
युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव वहाँ आते हैं। वे देखते हैं कि भीम बहुत प्रसन्न हैं।
यह सुनकर युधिष्ठिर जानना चाहते हैं कि युद्ध किससे होगा। भीम स्पष्ट करते हैं — बकासुर से।
4. युधिष्ठिर की चिन्ता
कुन्ती पूरी बात युधिष्ठिर को बताती हैं। युधिष्ठिर को यह उचित नहीं लगता क्योंकि वे जानते हैं कि भीम की शक्ति ही पाण्डवों का बड़ा सहारा है।
वे पूछते हैं कि जिस भीम की शक्ति का विचार करके दुर्योधन भी चैन से नहीं सोता, उसी भीम को राक्षस के पास भेजने का निर्णय कैसे किया गया?
5. अर्जुन की सहायता का प्रस्ताव
युधिष्ठिर बताते हैं कि बकासुर शक्तिशाली और नरभक्षी है। भीम निडर होकर कहते हैं कि वे उसे मार देंगे।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
6. भीम और बकासुर आमने-सामने
सबकी अनुमति मिलने पर भीम भोजन से भरी गाड़ी लेकर बकासुर के पास पहुँचते हैं। परन्तु बकासुर के लिए रखा हुआ भोजन भीम स्वयं खाने लगते हैं।
बक पूछता है कि उसने कौन-सा अधर्म किया है। भीम उत्तर देते हैं — नरभक्षणम्, अर्थात मनुष्यों को खाना।
7. भीम अपनी पहचान बताते हैं
भीम बताते हैं कि वे हिडिम्ब का वध करने वाले, साधुजनों के रक्षक और शक्तिशाली क्षत्रिय हैं।
निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥
बक समझ जाता है कि उसके सामने कुन्तीपुत्र भीमसेन खड़े हैं। दोनों एक-दूसरे को चुनौती देते हैं।
8. मल्लयुद्ध और बकासुर का अन्त
बक शस्त्र उठाने को कहता है, पर भीम कहते हैं कि उन्हें शस्त्र की आवश्यकता नहीं है। उनकी मुट्ठी ही बक के मस्तक की हड्डियाँ तोड़ने के लिए पर्याप्त है।
दोनों के बीच भयंकर मल्लयुद्ध होता है। अन्ततः भीम बकासुर का वध कर देते हैं और एकचक्र नगर को उसके भय से मुक्त करते हैं।
मुख्य पात्र और उनकी भूमिका
पाठ की मुख्य अवधारणाएँ
1. उपकार और प्रत्युपकार
दूसरों की सहायता को भूलना नहीं चाहिए। संकट के समय जिसने हमारी सहायता की हो, उसके प्रति कृतज्ञता दिखाना मानवीय कर्तव्य है।
2. क्षत्रिय-धर्म
भीम के अनुसार शक्तिशाली व्यक्ति का धर्म निर्बलों की रक्षा करना है। इसलिए वे बकासुर के अत्याचार को समाप्त करने को अपना कर्तव्य मानते हैं।
3. साहस और आत्मविश्वास
भीम अपने बल पर विश्वास रखते हैं, पर उनकी शक्ति केवल प्रदर्शन के लिए नहीं है। उसका उद्देश्य जनसुरक्षा है।
4. माता की आज्ञा
भीम माता की आज्ञा को सम्मान देते हैं और कहते हैं कि “मातुराज्ञा प्रत्यादेशं नार्हति” — माता की आज्ञा की अवज्ञा उचित नहीं है।
Imp पंक्तियाँ — सरल अर्थ सहित
अर्थ: किये गये उपकार का प्रत्युपकार होना चाहिए। यह सदा से मान्य धर्म है।
अर्थ: मनुष्यों की रक्षा करना राजाओं और क्षत्रियों का धर्म है।
अर्थ: भीम कहते हैं कि उनकी दो बलवान भुजाएँ ही उनके स्वाभाविक सहायक हैं।
रचनाकार — श्री एन. रङ्गनाथशर्मा
इस पाठ के मूल रूपक “एकचक्रम्” के रचनाकार महामहोपाध्याय एन. रङ्गनाथशर्मा थे। उनका जन्म 7 अप्रैल 1926 को कर्नाटक के शिवमोग्गा क्षेत्र के नडळल्ली ग्राम में हुआ।
वे संस्कृत व्याकरण, अलङ्कारशास्त्र और अद्वैत-वेदान्त के विद्वान थे। उन्होंने मौलिक ग्रन्थ, अनुवाद, व्याख्यान और अनेक लेख लिखे।
उनकी प्रसिद्ध संस्कृत रचनाओं में बाहुबलिविजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्जलिः और श्रीशङ्करचरितामृतम् आदि सम्मिलित हैं।
अभ्यास 1 — एकपदेन उत्तराणि
अभ्यास 2 — पूर्णवाक्येन उत्तराणि
अभ्यास 3 — केन / कया कं प्रति उक्तम्?
| वाक्यम् | केन / कया | कं / कां प्रति |
|---|---|---|
| न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति। | भीमेन | युधिष्ठिरम् |
| न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते। | भीमेन | अर्जुनम् |
| क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। | भीमेन | कुन्तीम् |
| अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे? | सहदेवेन | भीमम् |
| तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं न त्वया सङ्कल्पितम्? | युधिष्ठिरेण | कुन्तीम् |
| नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः। | बकेन | भीमम् |
अभ्यास 4 — सन्धिविच्छेद और सन्धिनाम
| पदम् | सन्धिविच्छेदः | सन्धिः |
|---|---|---|
| सम्यगनुष्ठितम् | सम्यक् + अनुष्ठितम् | जश्त्व-सन्धिः |
| पुरस्यादूरवर्तिनि | पुरस्य + अदूरवर्तिनि | सवर्णदीर्घ-सन्धिः |
| दुरात्मनो वृत्तम् | दुरात्मनः + वृत्तम् | विसर्ग-सन्धिः |
| मानुषोऽपि | मानुषः + अपि | विसर्ग-सन्धिः |
| नास्त्यत्र | नास्ति + अत्र | यण्-सन्धिः |
| यदुचितम् | यत् + उचितम् | जश्त्व-सन्धिः |
| खल्वेकपुत्रः | खलु + एकपुत्रः | यण्-सन्धिः |
| कथं न | कथम् + न | अनुस्वार-सन्धिः |
| धर्मसङ्ग्रहोऽत्र | धर्मसङ्ग्रहः + अत्र | विसर्ग-सन्धिः |
| राक्षस इति | राक्षसः + इति | विसर्ग-सन्धिः |
अभ्यास 5 — पर्यायवाचि-पदानां मेलनम्
| पदम् | पर्यायवाची |
|---|---|
| आयोधनम् | युद्धम् |
| विप्रः | ब्राह्मणः |
| असुरः | दैत्यः |
| अम्ब | जननी |
| हुताशनः | अग्निः |
अभ्यास 6 — विपरीतार्थक शब्द
| शब्दः | विपरीतार्थकः |
|---|---|
| पीवरः | कृशः |
| उपकृतः | अपकृतः |
| अग्रजस्य | अनुजस्य |
| उचितम् | अनुचितम् |
| हर्षः | शोकः |
अभ्यास 7 — समुचित विशेषणपद
| पदम् | समुचित विशेषणम् | पूर्ण पदसमूह |
|---|---|---|
| बाहू | पीवरौ | पीवरौ बाहू |
| मृष्टान्नम् | शकटपूर्णम् | शकटपूर्णं मृष्टान्नम् |
| ब्राह्मणः | प्रतिवेशी | प्रतिवेशी ब्राह्मणः |
| मृगाधिपः | खरदंष्ट्रः | खरदंष्ट्रः मृगाधिपः |
| भीमः | कौन्तेयः | कौन्तेयः भीमः |
| कुन्ती | क्षत्रियाणी | क्षत्रियाणी कुन्ती |
| हुताशनः | जठरस्थः | जठरस्थः हुताशनः |
अभ्यास 8 — समस्तपदानि लिखत
| विग्रहः | समस्तपदम् |
|---|---|
| मृष्टम् अन्नम् | मृष्टान्नम् |
| भुजयोः बलम् | भुजबलम् |
| धर्माणां सङ्ग्रहः | धर्मसङ्ग्रहः |
| मातुः आज्ञा | मातुराज्ञा |
| धनुः धरति इति | धनुर्धरः |
| मृगाणाम् अधिपः | मृगाधिपः |
| पुरस्य न दूरे वर्तते | पुरस्यादूरवर्ती |
अभ्यास 9 — वाक्य और उचित भाव
| वाक्यम् | भावः |
|---|---|
| धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि। | धैर्यम् |
| भीमस्य प्रेषणं कथं न त्वया सङ्कल्पितम्? | ग्लानिः |
| अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे? | हासः |
| हनिष्यामि तं दुरात्मानम्। | ओजः |
| स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते। | निराशा |
| मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। | अधिकारः |
अभ्यास 10 — वाच्यपरिवर्तनम्
नीचे कर्मवाच्य अथवा भावप्रधान प्रयोगों को कर्तृप्रधान रूप में बदला गया है।
| दत्त वाक्यम् | परिवर्तित रूपम् |
|---|---|
| भवत्या प्रतिश्रुतम्। | भवती प्रतिश्रुतवती। |
| क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्। | क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती। |
| भवत्या सज्जीक्रियताम्। | भवती सज्जीकरोतु। |
| भवत्या उपक्षिप्तम्। | भवती उपक्षिप्तवती। |
| त्वया सङ्कल्पितम्। | त्वं सङ्कल्पितवती। |
| भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः। | भवान् धर्मसङ्ग्रहं पश्यतु। |
| पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः। | पौरजनाः मानुषं प्रेषयन्तु। |
