वर्णोच्चारण-शिक्षा २ (Pronunciation Training – 2)
इस पाठ में हम यह समझते हैं कि मुख के भीतर स्थान, करण और विशेष प्रकार के आभ्यन्तर-प्रयत्न के मेल से संस्कृत वर्णों का शुद्ध उच्चारण किस प्रकार होता है।
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पिछली कक्षा में मनुष्य की वागुत्पत्ति-प्रक्रिया अर्थात ध्वनि बनने की सामान्य प्रक्रिया पढ़ी गयी थी। मुख के भीतर किसी वर्ण की उत्पत्ति के लिए तीन मुख्य तत्त्व आवश्यक हैं—
इस अध्याय का मुख्य विषय तीसरा तत्त्व — आभ्यन्तर-प्रयत्नः है।
वर्णोच्चारण के स्थान और करण
पाठ में छह मुख्य उच्चारण-स्थान और उनके अनुरूप करणों का अध्ययन किया गया है।
| क्रम | स्थानम् | करणम् | वर्ण-समूह |
|---|---|---|---|
| 1 | कण्ठः | कण्ठः — स्वस्थानम् | कण्ठ्याः |
| 2 | तालु | जिह्वा-मध्यः | तालव्याः |
| 3 | मूर्धा | जिह्वा-उपाग्रः | मूर्धन्याः |
| 4 | दन्ताः | जिह्वा-अग्रः | दन्त्याः |
| 5 | ओष्ठौ | ओष्ठौ — स्वस्थानम् | ओष्ठ्याः |
| 6 | नासिका | नासिका — स्वस्थानम् | नासिक्याः |
आभ्यन्तर-प्रयत्नः क्या है?
जब मुख के भीतर कोई करण अपने उच्चारण-स्थान को छूता है, थोड़ा छूता है, बहुत निकट पहुँचता है, कुछ दूरी पर रहता है या किसी विशेष प्रकार से संकुचित होता है— उस क्रिया को आभ्यन्तर-प्रयत्नः कहा जाता है।
1स्पृष्ट-प्रयत्नः
जब करण अपने स्थान को स्पष्ट रूप से छूता है, तब वह स्पृष्ट-प्रयत्नः कहलाता है।
इस प्रयत्न से वर्गीय अथवा स्पर्श-व्यञ्जनों का उच्चारण होता है।
क ख ग घ ङ आदि।
2ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः
जब करण स्थान को केवल थोड़ा-सा स्पर्श करता है, तब ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न होता है।
इसके अन्तर्गत— य र ल व आते हैं।
3ईषद्-विवृत-प्रयत्नः
इसमें करण स्थान को स्पर्श नहीं करता, परन्तु उसके बहुत समीप पहुँचता है। दोनों के बीच एक छोटा-सा अन्तर रहता है।
इससे ऊष्म-व्यञ्जन तथा अयोगवाह — अनुस्वार और विसर्ग उत्पन्न होते हैं।
ऊष्माः — श ष स ह
अयोगवाहौ — अं अः
4विवृत-प्रयत्नः
करण स्थान को नहीं छूता। दोनों के बीच स्पष्ट अन्तर रहता है।
ह्रस्व अ को छोड़कर अन्य स्वरों के उच्चारण में विवृत-प्रयत्न होता है।
5संवृत-प्रयत्नः
ह्रस्व अ एक विशेष स्वर है। इसके उच्चारण में कण्ठ के स्थान और करण के बीच सामान्य खुलापन न होकर संकोच होता है।
इसी संकुचित अवस्था को संवृत कहते हैं।
‘अ’ स्वर की विशेषता
पाठ में अकार के तीन रूप बताये गये हैं—
ये तीनों कण्ठ्य स्वर हैं, लेकिन इनके प्रयत्न समान नहीं हैं।
| स्वरः | उच्चारण की स्थिति | प्रयत्नः |
|---|---|---|
| अ | कण्ठ में संकोच | संवृतः |
| आ | स्थान-करण के बीच स्पष्ट अन्तर | विवृतः |
| अ३ | स्थान-करण के बीच स्पष्ट अन्तर | विवृतः |
सरल उदाहरण — अङ्गुली और लेखनी
पुस्तक एक सरल उदाहरण से स्थान, करण और प्रयत्न को समझाती है। जब हम उँगलियों से पेंसिल पकड़ते हैं—
वर्णमाला और आभ्यन्तर-प्रयत्न
1. स्वराः
स्वर स्वतन्त्र वर्ण हैं। उनके उच्चारण के लिए किसी अन्य वर्ण की आवश्यकता नहीं होती।
| वर्ग | प्रयत्नः |
|---|---|
| ह्रस्व अ | संवृत-प्रयत्नः |
| शेष स्वर | विवृत-प्रयत्नः |
2. व्यञ्जनानि
| व्यञ्जन-भेदः | वर्णाः | आभ्यन्तर-प्रयत्नः |
|---|---|---|
| स्पर्शाः |
क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म | स्पृष्टः |
| अन्तःस्थाः | य र ल व | ईषत्-स्पृष्टः |
| ऊष्माणः | श ष स ह | ईषद्-विवृतः |
| अयोगवाहौ | अं, अः | ईषद्-विवृतः |
स्वराणां भेदौ
पाठ में स्वर दो मुख्य वर्गों में समझाये गये हैं—
| विशेषता | समानाक्षर-स्वराः | सन्ध्यक्षर-स्वराः |
|---|---|---|
| उच्चारण-स्थान | एकस्थानी | द्विस्थानी |
| प्रथम उपभेद | ह्रस्वः | दीर्घः |
| उपभेद | ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत | दीर्घ, प्लुत |
| उदाहरण | अ, इ, उ, ऋ आदि | ए, ऐ, ओ, औ |
स्वर और व्यञ्जन में अन्तर
| आधार | स्वरः | व्यञ्जनम् |
|---|---|---|
| स्वतन्त्रता | स्वतन्त्र वर्ण | परतन्त्र वर्ण |
| उच्चारण | अन्य वर्ण की आवश्यकता नहीं | आधार-स्वर आवश्यक |
| मात्रा | एक, दो या तीन मात्रा | सामान्यतः अर्धमात्रिक |
| मुख्य प्रयत्न | विवृत; ह्रस्व अ में संवृत | स्पृष्ट / ईषत्-स्पृष्ट / ईषद्-विवृत |
पाणिनीय-शिक्षा में आभ्यन्तर-प्रयत्न
अध्याय के अन्त में पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों द्वारा यही विचार संक्षेप में पुनः प्रस्तुत किया गया है।
वर्णोच्चारण का प्रयत्न दो प्रकार का माना जाता है— आभ्यन्तर और बाह्य।
स्पर्श वर्णों में करण स्थान को स्पष्ट रूप से छूता है।
अन्तःस्थ वर्णों में करण स्थान को थोड़ा स्पर्श करता है।
ऊष्म वर्णों में करण स्थान के निकट रहता है पर पूर्ण स्पर्श नहीं करता।
सामान्य स्वर विवृत प्रयत्न से उच्चारित होते हैं।
ह्रस्व अकार अपवादरूप से संवृत प्रयत्न वाला है।
अभ्यास 1 — एकपदेन उत्तराणि
अभ्यास 2 — पूर्णवाक्येन उत्तराणि
अभ्यास 3 — मेलनं कुरुत
| प्रयत्नः | सही वर्णः | कारणम् |
|---|---|---|
| विवृत-प्रयत्नः | ॠ | स्वरः |
| स्पृष्ट-प्रयत्नः | ध् | स्पर्श-व्यञ्जनम् |
| ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः | व् | अन्तःस्थ-व्यञ्जनम् |
| ईषद्विवृत-प्रयत्नः | श् | ऊष्म-व्यञ्जनम् |
| संवृत-प्रयत्नः | अ | विशिष्ट ह्रस्व स्वरः |
अभ्यास 4 — आम् / न
| वाक्यम् | उत्तरम् |
|---|---|
| ‘ई’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। | न |
| ‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। | आम् |
| ‘झ’ वर्णः स्पर्शः अस्ति। | आम् |
| ‘र’ वर्णः स्पर्शेषु परिगण्यते। | न |
| ‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणः सन्ति। | न |
अभ्यास 5 — प्रश्ननिर्माणम्
अभ्यास 6 — वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत
| वर्ण-समूहः | उत्तरम् |
|---|---|
| एकस्थानि-वर्णाः | अ, आ, अ३, इ, ई, इ३, उ, ऊ, उ३, ऋ, ॠ, ऋ३, ऌ, ऌ३ |
| स्पर्श-व्यञ्जनानि | क ख ग घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म |
| अयोगवाह-व्यञ्जनानि | अं, अः |
| ऊष्म-व्यञ्जनानि | श, ष, स, ह |
| द्विस्थानि-वर्णाः | ए, ए३, ऐ, ऐ३, ओ, ओ३, औ, औ३ |
Imp Questions and Answers
Important Concepts — English Explanation
Place of Articulation
The स्थान is the fixed region inside the vocal tract where a particular sound is formed, such as the throat, palate, teeth or lips.
Articulating Tool
The करण is the moving or active part used to approach the place, such as the tip or middle of the tongue.
Internal Effort
The आभ्यन्तर-प्रयत्न tells us how the articulator behaves: whether it fully touches, slightly touches, comes very close, remains clearly open, or contracts.
