आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति
सः पण्डितः
A touching story of Namdev Maharaj that teaches compassion, अहिंसा and respect for every living being.
Table of Contents
Toggle1. पाठ का परिचय
भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्परा में भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता और बन्धुता जैसे जीवन-मूल्यों को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है।
इस पाठ में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त नामदेव महाराज के जीवन की एक घटना के माध्यम से करुणा की शिक्षा दी गई है।
नामदेव केवल भगवान पाण्डुरङ्ग के भक्त ही नहीं थे। उन्होंने अपने व्यवहार से यह दिखाया कि ईश्वर को केवल मन्दिर में नहीं, बल्कि सभी जीवों में देखना सच्ची भक्ति का महत्वपूर्ण रूप है।
2. कहानी — Kapila, Madhavi and Namdev
1 कपिल और माधवी का व्यवहार
अवकाश के समय कपिल और माधवी अपने मातुलगृह गए थे। खेलते समय उन्हें एक कुत्ता दिखाई दिया।
उन्होंने पत्थर लेकर उसे डराया और मारने के लिए उसके पीछे दौड़े। भयभीत कुत्ता तेज गति से भाग गया और दोनों बच्चे हँसने लगे।
उनकी मातामही ने यह घटना दूर से देखी। उसने बच्चों को बुलाया और उनसे पूछा कि वे ऐसा क्यों कर रहे थे।
2 मातामही की कहानी
बच्चों ने कहा कि कुत्ता उनके खेल के बीच आ रहा था, इसलिए उन्होंने उसे दण्ड दिया।
मातामही ने उन्हें खेल रोककर एक कहानी सुनने को कहा। उसने उन्हें महाराष्ट्र के प्रसिद्ध भक्त नामदेव महाराज के विषय में बताना आरम्भ किया।
3 नामदेव और पाण्डुरङ्ग
नामदेव भगवान पाण्डुरङ्ग के अत्यन्त प्रिय भक्त थे। पाठ में पाण्डुरङ्ग को नामदेव का प्रिय मित्र भी बताया गया है।
नामदेव प्रतिदिन भगवान को नैवेद्य समर्पित करते और उसके बाद ही स्वयं भोजन करते थे।
उनके गुरु विसोबा ने उन्हें शिक्षा दी कि— ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं रहता; उसका निवास सभी प्राणियों में है।
4 नैवेद्य और शुनक
एक दिन नामदेव अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति से नैवेद्य लेकर मन्दिर गए। उन्होंने नैवेद्य की थाली भगवान के सामने रखी और आँखें बन्द करके प्रार्थना की।
जब उन्होंने आँखें खोलीं तो थाली में रखी रोटी नहीं थी। वास्तव में एक भूखा कुत्ता रोटी मुँह में लेकर भाग गया था।
5 क्रोध नहीं, करुणा
कपिल और माधवी को लगा कि नामदेव कुत्ते को मारने के लिए उसके पीछे दौड़े होंगे। लेकिन मातामही ने बताया कि ऐसा नहीं हुआ।
नामदेव न तो लाठी लेकर दौड़े और न पत्थर लेकर। वे घृतपात्र लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े।
उनका विचार था कि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसे कष्ट हो सकता है। इसलिए वे उसे घी देना चाहते थे।
घृतम् अपि स्वीकरोतु।”
6 पाण्डुरङ्ग का प्रकट होना
दौड़ता हुआ कुत्ता अचानक दिखाई देना बन्द हो गया और उसके स्थान पर भगवान पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए।
उन्होंने नामदेव से कहा कि वे परीक्षा में सफल हुए, क्योंकि उन्होंने अपने गुरु की शिक्षा केवल सुनी ही नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारा भी।
नामदेव ने इस विचार को व्यवहार में सिद्ध किया।
7 बच्चों का परिवर्तन
कहानी सुनकर कपिल और माधवी को अपने व्यवहार पर पश्चात्ताप हुआ।
कपिल ने स्वीकार किया कि उसने बिना कारण कुत्ते को सताया था। माधवी ने भी क्षमा माँगी।
दोनों ने संकल्प किया कि वे किसी जीव को पीड़ा नहीं देंगे। मातामही ने उन्हें यह भी सिखाया कि केवल किसी को दुःख न देना ही पर्याप्त नहीं है; जहाँ सम्भव हो, दूसरों के दुःख को दूर करने का भी प्रयास करना चाहिए।
3. कहानी का दृश्यात्मक क्रम
4. “आत्मवत्सर्वभूतेषु” का अर्थ
इसका सरल भाव है— जो व्यक्ति सभी प्राणियों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान समझता है, वही वास्तव में ज्ञानी है।
5. नामदेव की नैवेद्य-प्रार्थना
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
प्रार्थना में नामदेव भगवान से निवेदन करते हैं कि वे उनका नैवेद्य स्वीकार करें, उनकी भक्ति को अचल बनाएँ और उन्हें इच्छित वर तथा श्रेष्ठ गति प्रदान करें।
वे शर्करा, दधि, दूध, घी तथा अन्य भोज्य पदार्थ भगवान को श्रद्धा से समर्पित करते हैं।
6. पाण्डुरङ्ग कौन हैं?
पाठ में बताया गया है कि भगवान पाण्डुरङ्ग को विठ्ठल, विठोबा, पण्ढरीनाथ और विठुमाऊली जैसे अनेक नामों से जाना जाता है।
महाराष्ट्र के सोलापुर जनपद में पण्ढरपुर प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र है, जो चन्द्रभागा नदी के तट पर स्थित है।
पाण्डुरङ्ग वारकरी सम्प्रदाय के आराध्य देवता हैं। उनका प्रसिद्ध स्वरूप ईंट पर खड़े हुए, दोनों हाथ कमर पर रखे हुए दर्शाया जाता है।
7. पाठ में मिलने वाले जीवन-मूल्य
भूतदया
किसी भी जीव की पीड़ा को समझना और उसे दूर करने का प्रयास करना।
अहिंसा
अपने शरीर, वाणी या मन से किसी को अनावश्यक पीड़ा न देना।
करुणा
दूसरे की कठिनाई देखकर केवल दुःखी होना नहीं, बल्कि उसकी सहायता करने का प्रयास करना।
समता
प्रत्येक जीव को आदर और संवेदना की दृष्टि से देखना।
गुरूपदेश का पालन
शिक्षा का वास्तविक मूल्य तब है जब उसे व्यवहार में उतारा जाए। नामदेव ने विसोबा की शिक्षा को अपने आचरण में सिद्ध किया।
8. व्याकरण — उपपदविभक्तयः
किसी विशेष पद के साथ उसके सम्बन्ध के कारण जो विभक्ति प्रयुक्त होती है, उसे यहाँ उपपदविभक्ति के रूप में समझाया गया है।
नामदेवः मन्दिरं प्रति गच्छति।
अर्थ: नामदेव मन्दिर की ओर जाते हैं।
कारणं विना / कारणेन विना / कारणात् विना
धिक् शुनकम्।
कपिलः मातामहीं निकषा आगतवान्।
निकषा = समीप
देवं परितः भक्ताः सन्ति।
परितः = चारों ओर
माधवी कपिलेन सह भ्रमति।
अलं क्रीडया।
अलं क्रोधेन।
9. व्याकरण — क्तवतु-प्रत्यय
भूतकाल में किसी व्यक्ति द्वारा पूर्ण की गई क्रिया को बताने के लिए क्तवतु प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
गम् → गतवान् (पुल्लिङ्ग)
गम् → गतवती (स्त्रीलिङ्ग)
गम् → गतवत् (नपुंसकलिङ्ग)
पुल्लिङ्ग — गतवत्
| विभक्ति | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गतवान् | गतवन्तौ | गतवन्तः |
| द्वितीया | गतवन्तम् | गतवन्तौ | गतवतः |
| तृतीया | गतवता | गतवद्भ्याम् | गतवद्भिः |
| चतुर्थी | गतवते | गतवद्भ्याम् | गतवद्भ्यः |
| पञ्चमी | गतवतः | गतवद्भ्याम् | गतवद्भ्यः |
| षष्ठी | गतवतः | गतवतोः | गतवताम् |
| सप्तमी | गतवति | गतवतोः | गतवत्सु |
स्त्रीलिङ्ग — गतवती
| विभक्ति | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गतवती | गतवत्यौ | गतवत्यः |
| द्वितीया | गतवतीम् | गतवत्यौ | गतवतीः |
| तृतीया | गतवत्या | गतवतीभ्याम् | गतवतीभिः |
| चतुर्थी | गतवत्यै | गतवतीभ्याम् | गतवतीभ्यः |
| पञ्चमी | गतवत्याः | गतवतीभ्याम् | गतवतीभ्यः |
| षष्ठी | गतवत्याः | गतवत्योः | गतवतीनाम् |
| सप्तमी | गतवत्याम् | गतवत्योः | गतवतीषु |
नपुंसकलिङ्ग — गतवत्
| विभक्ति | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गतवत् | गतवती | गतवन्ति |
| द्वितीया | गतवत् | गतवती | गतवन्ति |
| तृतीया | गतवता | गतवद्भ्याम् | गतवद्भिः |
| चतुर्थी | गतवते | गतवद्भ्याम् | गतवद्भ्यः |
| पञ्चमी | गतवतः | गतवद्भ्याम् | गतवद्भ्यः |
| षष्ठी | गतवतः | गतवतोः | गतवताम् |
| सप्तमी | गतवति | गतवतोः | गतवत्सु |
10. अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर
अभ्यास 1 — प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
अभ्यास 2 — वाक्यानि भूतकालेन परिवर्त्य लिखत
| वर्तमानकालीन वाक्यम् | भूतकालीन रूपम् |
|---|---|
| नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापयति। | नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। |
| नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं करोति। | नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं कृतवान्। |
| गुरुः विसोबा तम् अध्यापयति। | गुरुः विसोबा तम् अध्यापितवान्। |
| अहं शृणोमि। | अहं श्रुतवान्। |
| सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कुर्वन्ति। | सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः। |
| नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावति। | नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्। |
अभ्यास 3 — कः/का कं/कां प्रति कथयति?
| कथनम् | कः / का? | कं / कां प्रति? |
|---|---|---|
| कथां श्रोतुम् इच्छतः वा? | मातामही | कपिलं माधवीं च प्रति |
| अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान्। | माधवी | मातामहीं प्रति |
| किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति? | कपिलः | मातामहीं प्रति |
| अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु। | गुरुः विसोबा | नामदेवं प्रति |
| नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु। | नामदेवः | पाण्डुरङ्गं प्रति |
| धिक् शुनकम्। | कपिलः | शुनकं प्रति |
| नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु? | माधवी | कपिलं प्रति |
| किं घृतपात्रम् आधृत्य? | कपिलः माधवी च | मातामहीं प्रति |
| अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति। | कपिलः | मातामहीं प्रति |
| उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। | पाण्डुरङ्गः | नामदेवं प्रति |
अभ्यास 4 — रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
अभ्यास 5 — घटनाक्रमानुसारं लिखत
| क्रमः | घटना |
|---|---|
| 1 | नामदेवः मन्दिरं गतवान्। |
| 2 | नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। |
| 3 | नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान्। |
| 4 | शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्। |
| 5 | नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान्। |
| 6 | शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्। |
अभ्यास 6 — उचितां विभक्तिं योजयित्वा अनुच्छेदं पूरयत
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः। क्षीरेण सह तण्डुलाः पक्वाः। शर्करया विना कथं शक्यते? शीघ्रमेव आपणं प्रति गत्वा शर्कराम् आनयतु। आपणं निकषा वाहनानि तिष्ठन्ति। शर्करा महानसे स्थापिता। शर्करां परितः पिपीलिकाः आगताः।
पिपीलिकाः अपनीय पायसे शर्करा योजिता। मधुना विना पायसं रुचिकरं न भवति। अधुना पायसं परितः बालक-बालिकावृन्दं तिष्ठति। धिक् अन्यान् मधुरपदार्थान् इति एकः वदति। तेन विना जीवनम् अपूर्णम् इति अपरः। पायसेन सह एव भोजनं सरसम् इति अन्यः।
अभ्यास 7 — क्रियापदानां स्थाने क्तवतु-प्रत्ययान्त रूपाणि
कञ्चित् ग्रामं निकषा एका नदी आसीत्। नदी सर्वदा स्वच्छजलम् दत्तवती। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन जीवितवन्तः। एकः कृषकः तेन जलेन सर्वदा कृषिं कृतवान्।
कालान्तरे अन्ये कृषकाः अपि तेन जलेन क्षेत्रसेचनं कृतवन्तः। महिलाः पर्वसमये नदीं पूजितवत्यः। एकवारं कश्चित् परिवारः नद्यां मालिन्यानि क्षिप्तवान्। क्रमशः अन्ये अपि क्षिप्तवन्तः।
तेन नदी मलिना भूतवती, मीनाः मृतवन्तः, स्त्रियः रोगैः पीडिताः भूतवत्यः। तदा एका शिक्षिता बालिका जलस्य महत्त्वं सर्वान् उक्तवती।
सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षं रोपितवती। महिलाः अपि ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यं कृतवत्यः। सर्वे ग्रामवासिनः मिलित्वा नदीं शोधितवन्तः।
पुनः नदी स्वच्छा जाता निर्मलं जलं च दत्तवती। ततः आरभ्य वर्षे एकवारं जनाः नदीं पूजितवन्तः वृक्षरोपणं च कृतवन्तः।
अभ्यास 8 — समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत
| विग्रहः | समस्तपदम् |
|---|---|
| घृतस्य पात्रम्, तत् | घृतपात्रम् |
| पाषाणस्य खण्डः, तम् | पाषाणखण्डम् |
| प्रियः सुहृत् | प्रियसुहृत् |
| उदरे वेदना | उदरवेदना |
| स्वीयः व्यवहारः | स्वीयव्यवहारः |
| जीवनस्य मूल्यानि | जीवनमूल्यानि |
| मातुलस्य गृहम्, तत् | मातुलगृहम् |
| नरेषु रत्नानि इव, तेषाम् | नररत्नानाम् |
| स्वीयं कर्तृत्वम्, तेन | स्वीयकर्तृत्वेन |
| अपराधस्य भावना, तया | अपराधभावनया |
| गुरोः उपदेशः, तम् | गुरूपदेशम् |
| दिने दिने | प्रतिदिनम् |
| राजा ऋषिः इव, तेषाम् | राजर्षीणाम् |
