आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यतिसः पण्डितः Class 9 Notes and Answers

शारदा • कक्षा 9 • तृतीयः पाठः

आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति
सः पण्डितः

A touching story of Namdev Maharaj that teaches compassion, अहिंसा and respect for every living being.

करुणा Compassion मनुष्य Human पशु Animal सर्वभूतानि All beings आत्मवत् सर्वेषां प्राणिनां प्रति व्यवहारः
Imp: The title teaches that a truly wise person treats other living beings with the same sensitivity with which he would wish to be treated himself.

1. पाठ का परिचय

भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्परा में भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता और बन्धुता जैसे जीवन-मूल्यों को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है।

इस पाठ में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त नामदेव महाराज के जीवन की एक घटना के माध्यम से करुणा की शिक्षा दी गई है।

नामदेव केवल भगवान पाण्डुरङ्ग के भक्त ही नहीं थे। उन्होंने अपने व्यवहार से यह दिखाया कि ईश्वर को केवल मन्दिर में नहीं, बल्कि सभी जीवों में देखना सच्ची भक्ति का महत्वपूर्ण रूप है।

In simple English: The chapter teaches that devotion is incomplete if we worship God but behave cruelly towards living beings.

2. कहानी — Kapila, Madhavi and Namdev

1 कपिल और माधवी का व्यवहार

अवकाश के समय कपिल और माधवी अपने मातुलगृह गए थे। खेलते समय उन्हें एक कुत्ता दिखाई दिया।

उन्होंने पत्थर लेकर उसे डराया और मारने के लिए उसके पीछे दौड़े। भयभीत कुत्ता तेज गति से भाग गया और दोनों बच्चे हँसने लगे।

उनकी मातामही ने यह घटना दूर से देखी। उसने बच्चों को बुलाया और उनसे पूछा कि वे ऐसा क्यों कर रहे थे।

2 मातामही की कहानी

बच्चों ने कहा कि कुत्ता उनके खेल के बीच आ रहा था, इसलिए उन्होंने उसे दण्ड दिया।

मातामही ने उन्हें खेल रोककर एक कहानी सुनने को कहा। उसने उन्हें महाराष्ट्र के प्रसिद्ध भक्त नामदेव महाराज के विषय में बताना आरम्भ किया।

3 नामदेव और पाण्डुरङ्ग

नामदेव भगवान पाण्डुरङ्ग के अत्यन्त प्रिय भक्त थे। पाठ में पाण्डुरङ्ग को नामदेव का प्रिय मित्र भी बताया गया है।

नामदेव प्रतिदिन भगवान को नैवेद्य समर्पित करते और उसके बाद ही स्वयं भोजन करते थे।

उनके गुरु विसोबा ने उन्हें शिक्षा दी कि— ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं रहता; उसका निवास सभी प्राणियों में है।

4 नैवेद्य और शुनक

एक दिन नामदेव अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति से नैवेद्य लेकर मन्दिर गए। उन्होंने नैवेद्य की थाली भगवान के सामने रखी और आँखें बन्द करके प्रार्थना की।

जब उन्होंने आँखें खोलीं तो थाली में रखी रोटी नहीं थी। वास्तव में एक भूखा कुत्ता रोटी मुँह में लेकर भाग गया था।

Turning point: A normal reaction might have been anger. Namdev's reaction was completely different.

5 क्रोध नहीं, करुणा

कपिल और माधवी को लगा कि नामदेव कुत्ते को मारने के लिए उसके पीछे दौड़े होंगे। लेकिन मातामही ने बताया कि ऐसा नहीं हुआ।

नामदेव न तो लाठी लेकर दौड़े और न पत्थर लेकर। वे घृतपात्र लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े।

उनका विचार था कि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसे कष्ट हो सकता है। इसलिए वे उसे घी देना चाहते थे।

“हे देव! शुष्कां रोटिकां मा खादतु,
घृतम् अपि स्वीकरोतु।”
Important English explanation: Namdev was not worried about losing his food. He was worried that the hungry animal might suffer while eating dry bread. This is the heart of the story.

6 पाण्डुरङ्ग का प्रकट होना

दौड़ता हुआ कुत्ता अचानक दिखाई देना बन्द हो गया और उसके स्थान पर भगवान पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए।

उन्होंने नामदेव से कहा कि वे परीक्षा में सफल हुए, क्योंकि उन्होंने अपने गुरु की शिक्षा केवल सुनी ही नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारा भी।

गुरु की शिक्षा — “ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति।”
नामदेव ने इस विचार को व्यवहार में सिद्ध किया।

7 बच्चों का परिवर्तन

कहानी सुनकर कपिल और माधवी को अपने व्यवहार पर पश्चात्ताप हुआ।

कपिल ने स्वीकार किया कि उसने बिना कारण कुत्ते को सताया था। माधवी ने भी क्षमा माँगी।

दोनों ने संकल्प किया कि वे किसी जीव को पीड़ा नहीं देंगे। मातामही ने उन्हें यह भी सिखाया कि केवल किसी को दुःख न देना ही पर्याप्त नहीं है; जहाँ सम्भव हो, दूसरों के दुःख को दूर करने का भी प्रयास करना चाहिए।

3. कहानी का दृश्यात्मक क्रम

कपिल और माधवी कुत्ते को डराते हैं अज्ञान + असंवेदनशीलता मातामही नामदेव की कथा सुनाती हैं शुनक नैवेद्य की रोटी लेकर भागता है नामदेव घी लेकर पीछे दौड़ते हैं क्रोध नहीं → करुणा पाण्डुरङ्ग प्रकट होते हैं सर्वेषु जीवेषु करुणा → सच्ची विद्वत्ता

4. “आत्मवत्सर्वभूतेषु” का अर्थ

आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।

इसका सरल भाव है— जो व्यक्ति सभी प्राणियों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान समझता है, वही वास्तव में ज्ञानी है।

आत्मवत् दृष्टि → संवेदना → करुणा → अहिंसा → सच्ची विद्वत्ता
Simple English: Wisdom is not merely knowing many things. A wise person can understand the suffering of others and responds with compassion.

5. नामदेव की नैवेद्य-प्रार्थना

नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥

प्रार्थना में नामदेव भगवान से निवेदन करते हैं कि वे उनका नैवेद्य स्वीकार करें, उनकी भक्ति को अचल बनाएँ और उन्हें इच्छित वर तथा श्रेष्ठ गति प्रदान करें।

वे शर्करा, दधि, दूध, घी तथा अन्य भोज्य पदार्थ भगवान को श्रद्धा से समर्पित करते हैं।

English idea: The prayer shows Namdev's deep devotion, but the story later shows that compassion towards a hungry animal is itself an expression of that devotion.

6. पाण्डुरङ्ग कौन हैं?

पाठ में बताया गया है कि भगवान पाण्डुरङ्ग को विठ्ठल, विठोबा, पण्ढरीनाथ और विठुमाऊली जैसे अनेक नामों से जाना जाता है।

महाराष्ट्र के सोलापुर जनपद में पण्ढरपुर प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र है, जो चन्द्रभागा नदी के तट पर स्थित है।

पाण्डुरङ्ग वारकरी सम्प्रदाय के आराध्य देवता हैं। उनका प्रसिद्ध स्वरूप ईंट पर खड़े हुए, दोनों हाथ कमर पर रखे हुए दर्शाया जाता है।

इस पाठ में पाण्डुरङ्ग और नामदेव का सम्बन्ध केवल देवता और भक्त का नहीं, बल्कि प्रिय मित्रों जैसा प्रस्तुत किया गया है।

7. पाठ में मिलने वाले जीवन-मूल्य

भूतदया

किसी भी जीव की पीड़ा को समझना और उसे दूर करने का प्रयास करना।

अहिंसा

अपने शरीर, वाणी या मन से किसी को अनावश्यक पीड़ा न देना।

करुणा

दूसरे की कठिनाई देखकर केवल दुःखी होना नहीं, बल्कि उसकी सहायता करने का प्रयास करना।

समता

प्रत्येक जीव को आदर और संवेदना की दृष्टि से देखना।

गुरूपदेश का पालन

शिक्षा का वास्तविक मूल्य तब है जब उसे व्यवहार में उतारा जाए। नामदेव ने विसोबा की शिक्षा को अपने आचरण में सिद्ध किया।

8. व्याकरण — उपपदविभक्तयः

किसी विशेष पद के साथ उसके सम्बन्ध के कारण जो विभक्ति प्रयुक्त होती है, उसे यहाँ उपपदविभक्ति के रूप में समझाया गया है।

प्रति + द्वितीया
नामदेवः मन्दिरं प्रति गच्छति।
अर्थ: नामदेव मन्दिर की ओर जाते हैं।
विना + द्वितीया / तृतीया / पञ्चमी
कारणं विना / कारणेन विना / कारणात् विना
धिक् + द्वितीया
धिक् शुनकम्।
निकषा + द्वितीया
कपिलः मातामहीं निकषा आगतवान्।
निकषा = समीप
परितः + द्वितीया
देवं परितः भक्ताः सन्ति।
परितः = चारों ओर
सह / साकम् / सार्धम् / समम् + तृतीया
माधवी कपिलेन सह भ्रमति।
अलम् + तृतीया
अलं क्रीडया।
अलं क्रोधेन।

9. व्याकरण — क्तवतु-प्रत्यय

भूतकाल में किसी व्यक्ति द्वारा पूर्ण की गई क्रिया को बताने के लिए क्तवतु प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण —
गम् → गतवान् (पुल्लिङ्ग)
गम् → गतवती (स्त्रीलिङ्ग)
गम् → गतवत् (नपुंसकलिङ्ग)

पुल्लिङ्ग — गतवत्

विभक्तिएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमागतवान्गतवन्तौगतवन्तः
द्वितीयागतवन्तम्गतवन्तौगतवतः
तृतीयागतवतागतवद्भ्याम्गतवद्भिः
चतुर्थीगतवतेगतवद्भ्याम्गतवद्भ्यः
पञ्चमीगतवतःगतवद्भ्याम्गतवद्भ्यः
षष्ठीगतवतःगतवतोःगतवताम्
सप्तमीगतवतिगतवतोःगतवत्सु

स्त्रीलिङ्ग — गतवती

विभक्तिएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमागतवतीगतवत्यौगतवत्यः
द्वितीयागतवतीम्गतवत्यौगतवतीः
तृतीयागतवत्यागतवतीभ्याम्गतवतीभिः
चतुर्थीगतवत्यैगतवतीभ्याम्गतवतीभ्यः
पञ्चमीगतवत्याःगतवतीभ्याम्गतवतीभ्यः
षष्ठीगतवत्याःगतवत्योःगतवतीनाम्
सप्तमीगतवत्याम्गतवत्योःगतवतीषु

नपुंसकलिङ्ग — गतवत्

विभक्तिएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमागतवत्गतवतीगतवन्ति
द्वितीयागतवत्गतवतीगतवन्ति
तृतीयागतवतागतवद्भ्याम्गतवद्भिः
चतुर्थीगतवतेगतवद्भ्याम्गतवद्भ्यः
पञ्चमीगतवतःगतवद्भ्याम्गतवद्भ्यः
षष्ठीगतवतःगतवतोःगतवताम्
सप्तमीगतवतिगतवतोःगतवत्सु

10. अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर

अभ्यास 1 — प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत

(क) मातामही कस्य कथां श्रावितवती?
उत्तर: मातामही नामदेवमहाराजस्य कथां श्रावितवती।
(ख) नामदेवस्य गुरुः नामदेवं किम् अध्यापितवान्?
उत्तर: नामदेवस्य गुरुः विसोबा नामदेवम् अध्यापितवान् यत् ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति।
(ग) नामदेवः कया भावनया धावनं कृतवान्?
उत्तर: नामदेवः करुणया धावनं कृतवान्।
(घ) बालकयोः मुखे किमर्थं म्लाने संजाते?
उत्तर: अपराधभावनया बालकयोः मुखे म्लाने संजाते।
(ङ) कपिलः माधवी च कं सङ्कल्पं कृतवन्तौ?
उत्तर: कपिलः माधवी च कदापि कस्यापि जीवस्य पीडां न जनयिष्यतः इति सङ्कल्पं कृतवन्तौ।
(च) “तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं स्वीकृत्य मारयितुं धावितवन्तौ” इति वाक्ये “तम्” इति सर्वनामशब्दः कस्य कृते प्रयुक्तः?
उत्तर: “तम्” इति सर्वनामशब्दः शुनकस्य कृते प्रयुक्तः।
(छ) कपिलः माधवी च कुत्र गतवन्तौ?
उत्तर: कपिलः माधवी च मातुलगृहं गतवन्तौ।
(ज) “मातामही तं प्रसङ्गं दृष्टवती, तौ आहूतवती च” इति वाक्ये “तौ” इति शब्दः कस्यां विभक्तौ अस्ति?
उत्तर: “तौ” इति शब्दः द्वितीया-विभक्तेः द्विवचने अस्ति।

अभ्यास 2 — वाक्यानि भूतकालेन परिवर्त्य लिखत

वर्तमानकालीन वाक्यम्भूतकालीन रूपम्
नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापयति।नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्।
नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं करोति।नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं कृतवान्।
गुरुः विसोबा तम् अध्यापयति।गुरुः विसोबा तम् अध्यापितवान्।
अहं शृणोमि।अहं श्रुतवान्।
सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कुर्वन्ति।सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः।
नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावति।नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्।

अभ्यास 3 — कः/का कं/कां प्रति कथयति?

कथनम्कः / का?कं / कां प्रति?
कथां श्रोतुम् इच्छतः वा?मातामहीकपिलं माधवीं च प्रति
अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान्।माधवीमातामहीं प्रति
किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति?कपिलःमातामहीं प्रति
अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु।गुरुः विसोबानामदेवं प्रति
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।नामदेवःपाण्डुरङ्गं प्रति
धिक् शुनकम्।कपिलःशुनकं प्रति
नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु?माधवीकपिलं प्रति
किं घृतपात्रम् आधृत्य?कपिलः माधवी चमातामहीं प्रति
अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति।कपिलःमातामहीं प्रति
उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्।पाण्डुरङ्गःनामदेवं प्रति

अभ्यास 4 — रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत

(क) देवः नामदेवं परितः भवति स्म।
उत्तर: देवः कं परितः भवति स्म?
(ख) ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति।
उत्तर: ईश्वरः केषु निवसति?
(ग) शुनकः आगत्य मुखे रोटिकां धृत्वा धावितवान्।
उत्तर: शुनकः आगत्य मुखे किं धृत्वा धावितवान्?
(घ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्।
उत्तर: शुनकस्य स्थाने कः आविर्भूतवान्?
(ङ) आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।
उत्तर: आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः कः?

अभ्यास 5 — घटनाक्रमानुसारं लिखत

क्रमःघटना
1नामदेवः मन्दिरं गतवान्।
2नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्।
3नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान्।
4शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्।
5नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान्।
6शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्।

अभ्यास 6 — उचितां विभक्तिं योजयित्वा अनुच्छेदं पूरयत

पूर्ण अनुच्छेद:

आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः। क्षीरेण सह तण्डुलाः पक्वाः। शर्करया विना कथं शक्यते? शीघ्रमेव आपणं प्रति गत्वा शर्कराम् आनयतु। आपणं निकषा वाहनानि तिष्ठन्ति। शर्करा महानसे स्थापिता। शर्करां परितः पिपीलिकाः आगताः।

पिपीलिकाः अपनीय पायसे शर्करा योजिता। मधुना विना पायसं रुचिकरं न भवति। अधुना पायसं परितः बालक-बालिकावृन्दं तिष्ठति। धिक् अन्यान् मधुरपदार्थान् इति एकः वदति। तेन विना जीवनम् अपूर्णम् इति अपरः। पायसेन सह एव भोजनं सरसम् इति अन्यः।

Grammar reminder: प्रति, निकषा and परितः normally take द्वितीया; सह takes तृतीया; विना can be used with द्वितीया, तृतीया or पञ्चमी.

अभ्यास 7 — क्रियापदानां स्थाने क्तवतु-प्रत्ययान्त रूपाणि

कञ्चित् ग्रामं निकषा एका नदी आसीत्। नदी सर्वदा स्वच्छजलम् दत्तवती। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन जीवितवन्तः। एकः कृषकः तेन जलेन सर्वदा कृषिं कृतवान्।

कालान्तरे अन्ये कृषकाः अपि तेन जलेन क्षेत्रसेचनं कृतवन्तः। महिलाः पर्वसमये नदीं पूजितवत्यः। एकवारं कश्चित् परिवारः नद्यां मालिन्यानि क्षिप्तवान्। क्रमशः अन्ये अपि क्षिप्तवन्तः।

तेन नदी मलिना भूतवती, मीनाः मृतवन्तः, स्त्रियः रोगैः पीडिताः भूतवत्यः। तदा एका शिक्षिता बालिका जलस्य महत्त्वं सर्वान् उक्तवती।

सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षं रोपितवती। महिलाः अपि ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यं कृतवत्यः। सर्वे ग्रामवासिनः मिलित्वा नदीं शोधितवन्तः।

पुनः नदी स्वच्छा जाता निर्मलं जलं च दत्तवती। ततः आरभ्य वर्षे एकवारं जनाः नदीं पूजितवन्तः वृक्षरोपणं च कृतवन्तः।

अभ्यास 8 — समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत

विग्रहःसमस्तपदम्
घृतस्य पात्रम्, तत्घृतपात्रम्
पाषाणस्य खण्डः, तम्पाषाणखण्डम्
प्रियः सुहृत्प्रियसुहृत्
उदरे वेदनाउदरवेदना
स्वीयः व्यवहारःस्वीयव्यवहारः
जीवनस्य मूल्यानिजीवनमूल्यानि
मातुलस्य गृहम्, तत्मातुलगृहम्
नरेषु रत्नानि इव, तेषाम्नररत्नानाम्
स्वीयं कर्तृत्वम्, तेनस्वीयकर्तृत्वेन
अपराधस्य भावना, तयाअपराधभावनया
गुरोः उपदेशः, तम्गुरूपदेशम्
दिने दिनेप्रतिदिनम्
राजा ऋषिः इव, तेषाम्राजर्षीणाम्

11. Important Questions and Answers

प्रश्न 1. नामदेव महाराज की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: कहानी हमें सभी जीवों के प्रति करुणा और संवेदना रखने की शिक्षा देती है। सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है; वह हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
प्रश्न 2. विसोबा ने नामदेव को क्या शिक्षा दी?
उत्तर: विसोबा ने समझाया कि ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, बल्कि सभी प्राणियों में निवास करता है। इसलिए प्रत्येक जीव के प्रति श्रद्धा और करुणा रखनी चाहिए।
प्रश्न 3. नामदेव कुत्ते के पीछे क्यों दौड़े?
उत्तर: नामदेव कुत्ते को दण्ड देने के लिए नहीं दौड़े। वे घी लेकर इसलिए उसके पीछे दौड़े क्योंकि उन्हें चिन्ता थी कि सूखी रोटी खाने से कुत्ते को कष्ट हो सकता है।
प्रश्न 4. नामदेव की परीक्षा किस प्रकार हुई?
उत्तर: भूखा कुत्ता नैवेद्य की रोटी लेकर भागा। इस स्थिति में नामदेव ने क्रोध न करके करुणा दिखाई। इस प्रकार उन्होंने सिद्ध किया कि वे सभी जीवों में ईश्वर देखते हैं।
प्रश्न 5. पाण्डुरङ्ग ने नामदेव को परीक्षा में सफल क्यों कहा?
उत्तर: क्योंकि नामदेव ने अपने गुरु का उपदेश केवल सुना नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थिति में उसका पालन भी किया।
प्रश्न 6. कपिल और माधवी में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर: कहानी सुनने के बाद दोनों को अपने द्वारा कुत्ते को सताने पर पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने भविष्य में किसी भी जीव को पीड़ा न देने का संकल्प किया।
प्रश्न 7. “आत्मवत्सर्वभूतेषु” का क्या भाव है?
उत्तर: इसका भाव है कि हमें प्रत्येक जीव के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान समझकर उसके प्रति संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए।
प्रश्न 8. पाठ में सच्ची विद्वत्ता किसे माना गया है?
उत्तर: केवल पुस्तकीय ज्ञान को सच्ची विद्वत्ता नहीं माना गया है। जो व्यक्ति सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखता है और उन्हें अपने समान समझता है, वही वास्तव में पण्डित है।
प्रश्न 9. शरीर, वाणी और मन के विषय में मातामही ने क्या शिक्षा दी?
उत्तर: मातामही ने शिक्षा दी कि हमारे शरीर, वाणी अथवा मन के कारण किसी को पीड़ा नहीं होनी चाहिए। यदि किसी को कष्ट हो रहा हो तो उसे दूर करने का प्रयास भी करना चाहिए।
प्रश्न 10. इस कहानी में भक्ति और करुणा का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर: कहानी में भक्ति को केवल भगवान की पूजा से नहीं, बल्कि जीवों के प्रति प्रेम और करुणा से जोड़ा गया है। सभी जीवों में ईश्वर को देखना ही नामदेव की भक्ति की वास्तविक परीक्षा थी।