उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञः
तथापायं च चिन्तयेत्
A Panchatantra story about wisdom, honesty, foresight, greed and the importance of thinking about both a plan and its possible danger.
Table of Contents
Toggle1. पाठ का परिचय
पाठ की शुरुआत एक बालक और उसकी माता के संवाद से होती है। बालक को मार्ग में किसी का गिरा हुआ धन मिलता है और वह उससे खिलौने खरीदना चाहता है।
माता उसे समझाती है कि वह धन किसी अन्य व्यक्ति के परिश्रम से अर्जित हुआ है, इसलिए उसे उसके वास्तविक स्वामी को लौटाना चाहिए।
अर्थात् दूसरे के धन में लालच नहीं करना चाहिए। इसे अपने लिए मूल्यवान सम्पत्ति न मानकर तृण के समान समझना चाहिए।
इसी बात को समझाने के लिए माता पञ्चतन्त्र की धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा सुनाती है।
2. पञ्चतन्त्रम्
पञ्चतन्त्र नीति-शिक्षा देने वाली रोचक कथाओं का प्रसिद्ध संग्रह है। पाठ में इसके रचयिता विष्णुशर्मा बताए गए हैं।
पशु-पक्षियों तथा मनुष्यों की कथाओं के माध्यम से नीति के गहरे सिद्धान्त सरल रूप में समझाए जाते हैं।
पञ्चतन्त्र के पाँच तन्त्र हैं:
3. धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा
1 दो मित्र
किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक दो मित्र रहते थे। उनके नाम ही उनके स्वभाव का संकेत देते हैं।
पापबुद्धि दरिद्र था और उसके मन में छल की भावना थी। उसने सोचा कि धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देश जाएगा, उसके सहारे धन कमाएगा और अवसर मिलने पर उसे भी धोखा देगा।
2 देशान्तर जाने की योजना
पापबुद्धि धर्मबुद्धि को यात्रा के लाभ समझाता है। वह कहता है कि जिसने विभिन्न देशों की भाषा, वेशभूषा और संस्कृति नहीं देखी, उसका जीवन-अनुभव अधूरा रहता है।
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥
दोनों गुरुजनों की अनुमति लेकर शुभ दिन में देशान्तर जाते हैं और वहाँ पर्याप्त धन अर्जित करते हैं।
3 अर्जित धन को जंगल में छिपाना
वर्षों बाद दोनों अपने गाँव लौटने का निर्णय करते हैं। गाँव के निकट पहुँचकर पापबुद्धि सुझाव देता है कि पूरा धन घर ले जाना उचित नहीं है।
दोनों गहन वन में भूमि खोदकर अधिकांश धन वहाँ छिपा देते हैं और थोड़ी राशि लेकर अपने घर चले जाते हैं।
4 पापबुद्धि की चोरी
उसी रात पापबुद्धि अकेला वन में जाता है। वह गड्ढे से पूरा धन निकाल लेता है, गड्ढा भर देता है और अपने घर लौट आता है।
5 चोरी का आरोप धर्मबुद्धि पर
कुछ दिनों बाद पापबुद्धि धन की आवश्यकता का बहाना बनाकर धर्मबुद्धि को जंगल ले जाता है।
गड्ढा खोदने पर उन्हें खाली पात्र मिलता है। तब पापबुद्धि स्वयं चोरी करने के बाद भी धर्मबुद्धि पर धन चुराने का आरोप लगा देता है।
धर्मबुद्धि उसका आरोप अस्वीकार करता है और कहता है:
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥
6 न्यायाधिकारी के पास विवाद
दोनों न्यायाधिकारी के पास जाते हैं। प्रत्यक्ष मानव-साक्षी उपलब्ध न होने के कारण न्यायाधिकारी कहता है कि वे अगले दिन वन में जाएँगे और वनदेवता से सत्य का निर्णय कराया जाएगा।
7 पापबुद्धि की नई चाल
पापबुद्धि घर लौटकर अपने पिता को सारी योजना बताता है। वह पिता से कहता है कि वन में एक बड़ी शमी के वृक्ष का खोखला भाग है।
पिता को उसमें छिपकर अगले दिन यह कहना है कि धन धर्मबुद्धि ने चुराया है।
पापबुद्धि ने उपाय तो सोच लिया, पर उस उपाय के अपाय को नहीं सोचा।
8 वृक्ष से झूठी साक्षी
अगले दिन धर्मबुद्धि, पापबुद्धि, न्यायाधिकारी और अन्य लोग वृक्ष के पास पहुँचते हैं।
पापबुद्धि वनदेवता से पूछता है कि दोनों में चोर कौन है। वृक्ष के कोटर में छिपा उसका पिता उत्तर देता है— “धर्मबुद्धि ने धन चुराया है।”
उपस्थित लोग इसे दिव्य साक्षी समझकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
9 धर्मबुद्धि की बुद्धिमत्ता
धर्मबुद्धि समझ जाता है कि यह सामान्य घटना नहीं है। वह वृक्ष के कोटर के चारों ओर जलने योग्य सामग्री रखकर अग्नि प्रज्वलित करता है।
अग्नि से पीड़ित होकर पापबुद्धि का पिता बाहर निकलता है। वह सबके सामने स्वीकार करता है कि यह पूरी योजना पापबुद्धि की थी।
10 सत्य की विजय
न्यायाधिकारी पापबुद्धि को दोषी घोषित करता है। राजपुरुष उसे नियमानुसार दण्डित करते हैं और धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हैं।
पापबुद्धि की अविवेकी चाल के कारण उसके पिता को भी प्राण गँवाने पड़े। इसलिए कथा के अन्त में कहा गया है—
4. कहानी का दृश्यात्मक क्रम
5. शीर्षक की व्याख्या
उपायः का अर्थ है किसी उद्देश्य को पूरा करने की योजना या साधन। अपायः का अर्थ है उस योजना से उत्पन्न होने वाला सम्भावित संकट।
पापबुद्धि ने वृक्ष के भीतर अपने पिता को छिपाकर झूठी साक्षी दिलाने का उपाय तो बनाया, पर यह नहीं सोचा कि यदि उस छल की जाँच की गई तो उसके पिता संकट में पड़ सकते हैं।
6. महत्वपूर्ण पंक्तियाँ और भाव
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥
सदाचारी व्यक्ति दूसरे की स्त्री को माता के समान सम्मान देता है, दूसरे के धन को मिट्टी या पत्थर के समान समझकर उस पर लालच नहीं करता और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
इस श्लोक का भाव यह है कि मनुष्य को यह सोचकर सदाचार करना चाहिए कि उसका व्यवहार संसार से छिपा हुआ नहीं है। दिन-रात, प्रकृति, उसका अपना हृदय और धर्म उसके कर्मों के साक्षी हैं।
7. व्याकरण — नित्यबहुवचनान्त शब्द
संस्कृत में कुछ शब्द सामान्य रूप से बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं।
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| आपः | जल |
| दाराः | पत्नी |
| लाजाः | खील |
| अक्षतानि | चावल के अक्षत |
| प्राणाः | जीवन-शक्ति |
| असवः | प्राण |
| वर्षाः | वर्षा |
| सिकताः | रेत |
8. विशेषण और विशेष्य
विशेषण और विशेष्य के बीच लिङ्ग, विभक्ति और वचन का सम्बन्ध रहता है।
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| लिङ्ग सम्बन्ध | नूतनं भवनम् — नूतनः विद्यालयः |
| वचन सम्बन्ध | चतुरः बालः — चतुराः बालाः |
| विभक्ति सम्बन्ध | बुद्धिमती गृहिणी — बुद्धिमत्या गृहिण्या |
सर्वनाम शब्द भी विशेषण की तरह प्रयुक्त हो सकते हैं: एतेन धनेन, एनं धर्मबुद्धिम्, यः चौरः, तस्मिन् वृक्षे आदि।
9. क्तवतु-प्रत्यय
भूतकाल में कर्ता द्वारा पूर्ण की गई क्रिया बताने के लिए क्तवतु प्रत्यय का प्रयोग होता है। इसका रूप कर्ता के लिङ्ग और वचन के अनुसार बदलता है।
| धातु | पुल्लिङ्ग | स्त्रीलिङ्ग | नपुंसकलिङ्ग |
|---|---|---|---|
| पठ् | पठितवान् | पठितवती | पठितवत् |
| खाद् | खादितवान् | खादितवती | खादितवत् |
| कृ | कृतवान् | कृतवती | कृतवत् |
10. तत्पुरुषसमासः
तत्पुरुष समास में सामान्यतः उत्तरपद प्रधान होता है। पूर्वपद की विभक्ति का लोप होकर दोनों पद एक हो जाते हैं।
| विग्रह | समस्त पद | प्रकार |
|---|---|---|
| शरणम् आगतः | शरणागतः | द्वितीया तत्पुरुषः |
| सुखेन अन्वितः | सुखान्वितः | तृतीया तत्पुरुषः |
| छात्रेभ्यः हितम् | छात्रहितम् | चतुर्थी तत्पुरुषः |
| रोगात् भयम् | रोगभयम् | पञ्चमी तत्पुरुषः |
| देशस्य भक्तः | देशभक्तः | षष्ठी तत्पुरुषः |
| कार्ये कुशलः | कार्यकुशलः | सप्तमी तत्पुरुषः |
11. अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर
अभ्यास 1 — पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत
अभ्यास 2 — स्थूलाक्षरपदाधारित प्रश्ननिर्माणम्
अभ्यास 3 — कः कं प्रति कथयति?
| कथनम् | कः? | कं प्रति? |
|---|---|---|
| वत्स! द्रुतं वद येन तद्द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्। | पिता | पापबुद्धिं प्रति |
| प्रातःकाले युवाम् अस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। | धर्माधिकारी | धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च प्रति |
| त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। | पापबुद्धिः | धर्मबुद्धिं प्रति |
| भोः दुरात्मन्! मा माम् एवं वद। | धर्मबुद्धिः | पापबुद्धिं प्रति |
| एतत्सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। | पापबुद्धेः पिता | उपस्थितजनान् प्रति |
अभ्यास 4 — भूतकालिकवाक्यानि वर्तमानकालिकवाक्येषु परिवर्तयत
| भूतकालिक वाक्यम् | वर्तमानकालिक वाक्यम् |
|---|---|
| राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। | राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डयन्ति। |
| पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादितवान्। | पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादयति। |
| पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगतवान्। | पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगच्छति। |
| अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्। | अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् वदति। |
| सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः। | सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसन्ति। |
अभ्यास 5 — भावार्थानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयत
अभ्यास 6 — विग्रहं मेलनं वा कुरुत
| पदम् / विग्रहः | उत्तरम् |
|---|---|
| अर्थोपार्जनम् | अर्थस्य उपार्जनम् |
| गुरुजनाज्ञया | गुरुजनानाम् आज्ञया |
| वनदेवता | वनस्य देवता |
| वित्तस्य अभावात् | वित्ताभावात् |
| बुद्धिप्रभावेण | बुद्धेः प्रभावेण |
| धरण्याः पीठे | धरणीपीठे |
| राजकुले | राज्ञः कुले |
अभ्यास 7 — कथाक्रमानुसारं वाक्यानि पुनः लिखत
| क्रमः | घटना |
|---|---|
| 1 | कस्मिंश्चिद् देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। |
| 2 | ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। |
| 3 | यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। |
| 4 | द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावत् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। |
| 5 | भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति। |
| 6 | राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। |
