भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारी वीरों ने अपना बलिदान दिया। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ जैसा प्रसिद्ध तराना लिखने वाले रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ भी उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र तीस वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार द्वारा उन्हें फ़ाँसी पर लटका दिया गया।
असाधारण प्रतिभा के धनी बिस्मिल एक अच्छे कवि और लेखक भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा काफ़ी चर्चित रही। ‘मेरी माँ’ उसी आत्मकथा का एक अंश है।
In English: Ram Prasad ‘Bismil’ was a great revolutionary and poet of India’s freedom struggle. The British hanged him when he was just 30 years old. This lesson is a part of his autobiography, where he lovingly remembers his mother, who shaped his character and his patriotism.
पाठ का परिचय — आत्मकथा कैसे लिखी गई?
भगत सिंह ने बिस्मिल के बारे में कहा था कि वे बड़े होनहार नौजवान और ग़ज़ब के शायर थे। जानने वाले कहते थे कि यदि वे किसी और जगह, देश या समय में पैदा हुए होते तो सेनाध्यक्ष बनते।
बिस्मिल छोटी-सी आयु से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेज़ों से लड़ते रहे। अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल भेजा और फ़ाँसी की सज़ा दी। जेल में रहते हुए उन्होंने चोरी-छिपे अपनी आत्मकथा लिखी और उसे अंग्रेज़ों से बचाते हुए जेल से बाहर भेजते रहे। साथियों ने उसे ‘निज जीवन की एक छटा’ नाम से प्रकाशित करवा दिया।
Imp बात: इस आत्मकथा के कारण अंग्रेज़ों के होश उड़ गए। इसने लोगों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध क्रोध और बढ़ा दिया। इसीलिए कहा जाता है कि अंग्रेज़ बिस्मिल को फ़ाँसी देने के बाद भी उन्हें हरा न सके।
In English: Bismil secretly wrote his autobiography in jail and smuggled the pages out. Even after his death, his writing kept inspiring people to fight the British — showing that ideas cannot be executed.
मेरी माँ — कहानी का मुख्य भाग
1. लखनऊ कांग्रेस और सेवा-समिति
बिस्मिल की लखनऊ कांग्रेस में जाने की बड़ी इच्छा थी। दादीजी और पिताजी विरोध करते रहे, किंतु माताजी ने उन्हें खर्च दे ही दिया। शाहजहाँपुर में सेवा-समिति के आरंभ पर वे बड़े उत्साह से उसमें सहयोग देते थे। इस प्रकार के कार्य पिताजी और दादीजी को अच्छे नहीं लगते थे, पर माताजी उनका उत्साह भंग न होने देतीं।
“वास्तव में, मेरी माताजी देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी की ही कृपा का परिणाम है।”
2. वकालतनामे पर हस्ताक्षर से इनकार
एक बार पिताजी किसी दीवानी मुकदमे में वकील से यह कहकर बाहर चले गए कि जो काम हो, वह बिस्मिल से करा लें। वकील ने बिस्मिल को बुलाकर कहा कि वे पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर कर दें। बिस्मिल ने तुरंत उत्तर दिया कि यह धर्म-विरुद्ध होगा और ऐसा पाप वे कभी नहीं कर सकते। वकील के बहुत समझाने पर भी उन पर कोई प्रभाव न पड़ा।
Imp विचार: बिस्मिल अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करते थे — चाहे कुछ भी हो जाए, वे सत्य ही कहते थे।
3. माताजी की शिक्षा-यात्रा
माताजी ग्यारह वर्ष की उम्र में विवाह करके शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय वे नितांत अशिक्षित, एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। थोड़े ही दिनों में उन्होंने घर के सारे काम-काज को समझ लिया और भोजन आदि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं।
बिस्मिल के जन्म के पाँच-सात वर्ष बाद माताजी ने स्वयं हिंदी पढ़ना आरंभ किया। मुहल्ले की जो सखी-सहेली शिक्षित थीं, उनसे वे अक्षर-बोध करतीं और घर का काम पूरा होने के बाद जो समय मिलता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम से थोड़े ही दिनों में वे देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं और अपनी बेटियों को भी शिक्षा देतीं।
In English: Bismil’s mother married at just eleven and was completely uneducated at first. Through her own willpower she learned Hindi from literate neighbours and later even educated her daughters — a remarkable act for a woman of that time.
4. माँ की सबसे बड़ी सीख
माताजी ने बिस्मिल से आर्यसमाज में प्रवेश के बाद खूब वार्तालाप किया और उनके विचार उदार होते गए। बिस्मिल मानते हैं कि यदि उन्हें ऐसी माता न मिलतीं तो वे भी साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर रह जाते।
माँ का सबसे बड़ा आदेश: “किसी की प्राणहानि न हो। अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना।” — इस आदेश की पूर्ति के लिए बिस्मिल को मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ी थी।
5. माँ को अंतिम पत्र
बिस्मिल अपनी माँ को ‘जन्मदात्री जननी’ कहकर संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि इस जीवन में तो क्या, अनेक जन्मों में भी वे माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकते। उन्होंने माँ से यही वर माँगा कि अंतिम समय में भी उनका हृदय विचलित न हो और वे परमात्मा का स्मरण करते हुए शरीर त्याग करें।
“जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा।”
In English: In his last letter Bismil calls his mother his ‘giver of life’. He says he can never repay her love even in many lifetimes, and asks her to stay strong like Guru Gobind Singh’s wife did — proud rather than broken by her son’s sacrifice for the motherland.
पाठ से · मेरी समझ से (सही उत्तर)
(1) ‘किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती।’ — बिस्मिल को अपनी किस इच्छा के पूर्ण न होने की आशंका थी?
▸ भारत माता के साथ रहने की▸ अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने कीअपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की▸ भोग-विलास तथा ऐश्वर्य भोगने की
कारण: बिस्मिल को पता था कि उन्हें फ़ाँसी होगी, इसलिए वे एक बार श्रद्धापूर्वक माँ के चरणों की सेवा करके जीवन सफल बनाना चाहते थे — पर यह इच्छा पूरी होती नहीं दिख रही थी।
(2) रामप्रसाद बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?
▸ देश की सेवा करेंकभी किसी के प्राण न लेना▸ कभी किसी से छल न करना▸ सदा सच बोलना
कारण: माँ का कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना — किसी की प्राणहानि न हो।
पंक्तियों पर चर्चा
(क) “यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।”
इस पंक्ति से पता चलता है कि बिस्मिल के जीवन को दिशा देने वाली उनकी माँ ही थीं। यदि उन्हें ऐसी उदार, साहसी और देशभक्त माँ न मिलतीं, तो वे भी आम लोगों की तरह केवल अपने घर-परिवार में उलझे रहते और देश के लिए कुछ बड़ा न कर पाते। माँ के संस्कारों ने ही उन्हें एक साधारण व्यक्ति से क्रांतिकारी बनाया।
(ख) “उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।”
माँ का आदेश था कि किसी की प्राणहानि न हो। बिस्मिल क्रांतिकारी थे, इसलिए कई बार परिस्थितियाँ ऐसी बनतीं कि किसी को मारना पड़ सकता था। पर माँ के आदेश का पालन करने के लिए उन्होंने अपनी क्रांतिकारी प्रतिज्ञा (योजना) को दो-एक बार तोड़ दिया, ताकि किसी की जान न जाए। यह दिखाता है कि वे माँ की सीख को कितना महत्व देते थे।
मिलकर करें मिलान (सही मिलान)
शब्द
सही अर्थ या संदर्भ
1. देवनागरी
भारत की एक भाषा-लिपि, जिसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं।
2. आर्यसमाज
महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित एक संस्था।
3. मेजिनी
इटली के गुप्त राष्ट्रवादी दल का सेनापति; इटली का मसीहा, जिसने लोगों को एक सूत्र में बाँधा।
4. गोबिंद सिंह
सिखों के दसवें और अंतिम गुरु; उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।
सोच-विचार के लिए
1(क) माताजी ने विवाह के बाद स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल कैसे ढाला?
माताजी ग्यारह वर्ष की उम्र में एक अशिक्षित ग्रामीण कन्या के रूप में आई थीं, फिर भी उन्होंने थोड़े ही दिनों में घर के सारे काम-काज को समझ लिया और भोजन आदि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। धीरे-धीरे उन्होंने पूरे परिवार की जिम्मेदारी सँभाल ली।
1(ख) उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को कैसे शिक्षित किया?
पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ। उन्होंने मुहल्ले की शिक्षित सखी-सहेलियों से अक्षर-बोध किया और घर का काम पूरा होने पर जो समय मिलता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम से थोड़े ही समय में वे देवनागरी की पुस्तकें पढ़ने लगीं।
2. बिस्मिल को साहसी बनाने में उनकी माता जी ने कैसे सहयोग दिया?
माताजी ने बिस्मिल का उत्साह कभी भंग नहीं होने दिया। कांग्रेस जाने के लिए खर्च दिया, सेवा-समिति के कार्यों में साथ दिया, और सत्य व निडरता के संस्कार दिए। उन्होंने विवाह के लिए दबाव न डालकर पहले शिक्षा पूरी करने पर बल दिया। इसी प्रोत्साहन और सद्व्यवहार से बिस्मिल में जीवन और साहस आया।
3. आज से कई दशक पहले बिस्मिल की माँ शिक्षा के महत्व को समझती थीं, बताइए कैसे?
उन्होंने स्वयं अशिक्षित होते हुए भी परिश्रम से हिंदी पढ़ना सीखा और देवनागरी की पुस्तकें पढ़ने लगीं। साथ ही उन्होंने अपनी बेटियों को भी छोटी आयु में शिक्षा दी और बिस्मिल के विवाह से पहले शिक्षा पूरी करने पर जोर दिया — यह उस समय के लिए असाधारण सोच थी।
4. हम कैसे कह सकते हैं कि बिस्मिल की माँ स्वतंत्र और उदार विचारों वाली थीं?
आर्यसमाज में प्रवेश के बाद उनके विचार और उदार होते गए। उन्होंने बेटे को देश-सेवा और सेवा-समिति के कार्यों में सहयोग दिया, बेटियों को शिक्षा दी, और अहिंसा (किसी की प्राणहानि न हो) जैसे ऊँचे मूल्य सिखाए। पुराने रीति-रिवाजों में बँधने के बजाय उन्होंने आधुनिक और मानवीय सोच अपनाई — यही उनके स्वतंत्र व उदार विचारों को दर्शाता है।
आत्मकथा की रचना
यह पाठ रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा का अंश है। आत्मकथा यानी अपनी कथा। दुनिया में अनेक लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं — कभी अपने लिए, तो कभी दूसरों के पढ़ने के लिए।
Imp पंक्तियाँ (जिनसे पता चलता है कि लेखक अपने बारे में कह रहा है):
“मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी की ही कृपा का परिणाम है।”
“मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म-विरुद्ध होगा...।”
“अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था।”
“जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया...।”
“उनके इस आदेश की पूर्ति के लिए मुझे... अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी थी।”
शब्द-प्रयोग तरह-तरह के
हम लेखन में दो शब्दों को मिलाकर छोटा बना लेते हैं, जिससे समय, स्याही और कागज़ की बचत होती है। जैसे — अक्षर-बोध = अक्षर का बोध/ज्ञान; पढ़ना-लिखना = पढ़ना और लिखना।
Imp: पाठ से ऐसे शब्द
अक्षर-बोध
पढ़ना-लिखना
डाँट-फटकार
सखी-सहेली
पालन-पोषण
चोरी-छिपे
जन्म-जन्मांतर
ठीक-ठीक
भोग-विलास
काम-काज
Imp शब्द व संदर्भ
बिस्मिल — रामप्रसाद जी का लेखकीय उपनाम (तख़ल्लुस)।
आत्मकथा — अपने जीवन की स्वयं द्वारा लिखी गई कथा (Autobiography)।
निज जीवन की एक छटा — बिस्मिल की आत्मकथा का प्रकाशित नाम।
वकालतनामा — किसी वकील को मुकदमा लड़ने का अधिकार देने वाला दस्तावेज़।
प्राणहानि / प्राणदंड — किसी की जान लेना / मृत्युदंड।
मेजिनी — इटली के स्वतंत्रता आंदोलन का नेता, जिससे बिस्मिल प्रेरित थे।
उऋण — ऋण से मुक्त हो जाना (कर्ज़ चुका देना)।
आज की पहेली — पाठ के 12 विशेषण
वर्ग पहेली में पाठ से छिपे बारह विशेषण ढूँढने हैं। पाठ में से कुछ प्रमुख विशेषण ये हैं:
होनहार
प्रसिद्ध
असाधारण
ग्रामीण
अशिक्षित
शिक्षित
उदार
मंगलमयी
स्वतंत्र / स्वाधीन
उज्ज्वल
तुच्छ
देवनागरी
(अपनी पाठ्यपुस्तक की वर्ग पहेली में इन शब्दों को खोजकर रेखांकित कीजिए।)
झरोखे से — ‘ऐ मातृभूमि!’
ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो।
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो।
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में;
संसार के हृदय में, तेरी प्रभा उदय हो।
तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो।
तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो।
वह भक्ति दे कि ‘बिस्मिल’ सुख में तुझे न भूले,
वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो। — रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
In English: In this famous prayer to the motherland, Bismil asks for such devotion that he never forgets his country in happiness, and such strength that his heart never turns coward in sorrow.