भूमिका (Introduction)
‘जलाते चलो’ एक प्रेरणादायक कविता है, जिसे प्रसिद्ध बाल-साहित्यकार द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने लिखा है। इस कविता में कवि हमें निराश न होने, चुनौतियों का सामना करने और दूसरों की भलाई के लिए निरंतर कार्य करते रहने का संदेश देते हैं।
यहाँ ‘दीप’ अच्छे कार्यों का और ‘स्नेह’ (प्रेम) उन कार्यों की ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि ‘तिमिर’ या ‘अँधेरा’ संसार की समस्याओं का प्रतीक है।
कविता (The Poem)
कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा॥
भाव: प्रेम से भरे दीप जलाते रहो, किसी न किसी दिन धरती का अँधेरा (दुःख) अवश्य दूर होगा।
कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी,
मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में
घिरी आ रही है अमावस निशा-सी॥
भाव: विज्ञान में इतनी शक्ति है कि वह अमावस्या के अँधेरे को भी पूर्णिमा-सा उजाला बना दे, फिर भी आज संसार में दिन में ही अँधेरा (समस्याएँ) क्यों छा रहा है?
बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा॥
भाव: जो बिजली के दीपक बिना प्रेम के जल रहे हैं, उन्हें बुझा दो; ऐसे उजाले से सच्चा रास्ता नहीं मिलेगा।
चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी,
तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने
बना दीप की नाव तैयार की थी॥
भाव: हे मनुष्य! सबसे पहला दीप तुमने ही जलाया और अँधेरे की चुनौती स्वीकार की। अँधेरे की नदी पार करने के लिए तुमने ही दीप रूपी नाव तैयार की।
कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा॥
भाव: उस नाव को लगातार बहाते चलो, अँधेरे के पार का किनारा (उजाला) अवश्य मिलेगा।
दिये अनगिनत हैं निरंतर जलाए,
समय साक्षी है कि जलते हुए दीप
अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए॥
भाव: युगों-युगों से मनुष्य ने अँधेरे रूपी चट्टान पर असंख्य दीप जलाए, पर समय गवाह है कि हवा (कठिनाइयों) ने कई दीप बुझा भी दिए।
उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा॥
भाव: जो दीप स्वयं बुझकर भी प्रकाश दे गए, उसी बलिदान से अँधेरे को उजाला मिलेगा।
चली आ रही और चलती रहेगी,
जली जो प्रथम बार लौ दीप की
स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी॥
भाव: दीपक और तूफ़ान का यह संघर्ष सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। पहली बार जली सोने-सी लौ जलती ही रहेगी।
कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा॥
भाव: यदि धरती पर एक भी दीप जलता रहेगा, तो कभी न कभी रात (अँधेरे) को सवेरा (उजाला) अवश्य मिलेगा।
प्रतीक चित्र (Symbols in the Poem)
अमावस्या और पूर्णिमा (The Science)
चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता; वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इसीलिए वह रोज़ घटता-बढ़ता दिखाई देता है।
- शुक्ल पक्ष: चंद्रमा की कला (part) धीरे-धीरे बढ़ती है → पूर्णिमा (पूरा चाँद)। ‘शुक्ल’ का अर्थ ‘उजला’।
- कृष्ण पक्ष: चंद्रमा की कला घटती है → अमावस्या (चाँद दिखाई नहीं देता)। ‘कृष्ण’ का अर्थ ‘काला’।
प्रश्न-उत्तर (Q & A — Solutions)
मेरी समझ से (सही उत्तर चुनिए)
1. निम्नलिखित में से कौन-सी बात इस कविता में मुख्य रूप से कही गई है?
✅ भलाई के कार्य करते रहना
कारण: पूरी कविता का मुख्य संदेश निरंतर अच्छे कार्य करना है।
2. “जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की, चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी” — यह वाक्य किससे कहा गया है?
✅ मनुष्यों से
कारण: कवि मनुष्य को संबोधित करके कहते हैं कि सबसे पहले अँधेरे से मनुष्य ने ही संघर्ष किया।
सोच-विचार के लिए
(क) कविता में अँधेरे या तिमिर के लिए किन वस्तुओं के उदाहरण दिए गए हैं?
तिमिर, अमावस, निशा और तूफ़ान — ये सभी अँधेरे (समस्याओं) के प्रतीक हैं।
(ख) इसमें क्या आशा की गई है? यह आशा क्यों की गई है?
आशा यह है कि धरती का अँधेरा (दुःख) एक दिन मिटेगा और सवेरा (सुख) आएगा। यह आशा इसलिए की गई है क्योंकि यदि मनुष्य निरंतर स्नेह भरे दीप (अच्छे कार्य) जलाता रहेगा, तो बुराई अवश्य समाप्त होगी।
(ग) कविता में किसे जलाने और किसे बुझाने की बात कही गई है?
जलाना: स्नेह से भरे दीप (अच्छे कार्य)। बुझाना: बिना स्नेह के जलने वाले विद्युत-दीप (दिखावटी/स्वार्थी उजाला)।
अर्थ की बात — सही शब्द चुनिए
1. बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर, कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।
2. रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि, कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।
3. जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की, चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी।
मिलान (स्तंभ 1 ↔ स्तंभ 2)
| स्तंभ 1 (पंक्ति) | स्तंभ 2 (भाव) |
|---|---|
| कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा। | विश्व की समस्याओं से एक न एक दिन छुटकारा अवश्य मिलेगा। |
| जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर। | दूसरों के सुख-चैन के लिए प्रयास करते रहिए। |
| मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में घिरी आ रही है अमावस निशा-सी। | विश्व में सुख-शांति क्यों कम होती जा रही है? |
| बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो, बुझाओ इन्हें। | विश्व की भलाई का ध्यान रखे बिना प्रगति करने से कोई लाभ नहीं होगा। |
पंक्ति से पंक्ति (गद्य में बदलिए)
1. तुम उस नाव को निरंतर बहाते चलो।
2. तुम स्नेह से भरकर ये दीये जलाते चलो।
3. इन्हें बुझाओ, इस प्रकार (तुम्हें) मार्ग नहीं मिल सकेगा।
4. मगर आज विश्व पर दिन में ही अमावस की रात-सी घिरी आ रही है।
तिथिपत्र (जनवरी 2023) — उत्तर
(क) दिए गए महीने में कुल 31 दिन हैं।
(ख) पूर्णिमा — 6 जनवरी, शुक्रवार; अमावस्या — 21 जनवरी, शनिवार।
(ग) कृष्ण पक्ष की सप्तमी (14) और शुक्ल पक्ष की सप्तमी (28) में 14 दिनों का अंतर है।
(घ) कृष्ण पक्ष में कुल 15 दिन (7 से 21 जनवरी) हैं।
(ङ) ‘वसंत पंचमी’ की तिथि — 26 जनवरी, गुरुवार।
Imp शब्द और अर्थ (Imp Terms)
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| अमावस | अमावस्या — जिस रात चाँद दिखाई नहीं देता |
| पूर्णिमा | पूर्णमासी — जिस रात पूरा चाँद दिखता है |
| तिमिर / निशा | अँधेरा / रात |
| सवेरा / उजेला | सुबह / उजाला |
| स्नेह | प्रेम |
| सरित | नदी |
| पवन | हवा |
| विद्युत-दिये | बिजली से जलने वाले दीपक/बल्ब |
| अनगिन / अनगिनत | जिसे गिना न जा सके |
| शिला | चट्टान |
याद रखने योग्य Imp बातें
- कवि — द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998), प्रसिद्ध बाल-साहित्यकार।
- यह एक आशा और उत्साह जगाने वाली प्रेरक कविता है।
- मुख्य संदेश — निराश न हों, चुनौतियों का सामना करें और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करें।
- ‘दीप’ = अच्छे कार्य · ‘अँधेरा’ = समस्याएँ · ‘स्नेह’ = प्रेम की ऊर्जा।
- इस कविता की हर पंक्ति को गाने में लगभग समान समय लगता है — इसी लय के कारण यह अधिक प्रभावशाली बनी है।
- ‘सा/सी/से’ समानता दिखाने के लिए प्रयोग होते हैं और इनसे पहले योजक चिह्न (-) लगता है, जैसे — निशा-सी, स्वर्ण-सी।
