मैं और मेरा देश
तथा निर्मल जीत सिंह सेखों
लेखक परिचय
कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का जन्म सन् 1906 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ था। ये हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार और पत्रकार थे। इन्होंने 'नया जीवन' और 'विकास' पत्रों का संपादन किया।
Table of Contents
Toggleप्रभाकर जी प्रारंभ से ही स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। इस कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक निबंध लिखे। अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के लिए उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
उनके प्रमुख निबंध-संग्रह: दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुस्कराई, झण बोले कण मुस्काए, माटी हो गई सोना आदि। सन् 1995 में उनका निधन हो गया।
निबंध परिचय: मैं और मेरा देश
यह निबंध व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को गहराई से स्थापित करता है। इसके अनुसार व्यक्ति की पूर्णता केवल उसकी निजता में नहीं, बल्कि उसके परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र की पहचान से जुड़ी हुई है। लेखक का मुख्य तर्क है कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं।
निबंध की व्याख्या
1. पूर्णता का भाव
लेखक कहते हैं कि वे अपने घर में जन्मे, पले, पड़ोस में खेले और पड़ोसियों की ममता-दुलार पा कर बड़े हुए। नगर में घूम-फिर कर उन्हें विशाल समाज का संपर्क मिला। उन्होंने सोचा कि वे अब पूर्ण मनुष्य बन गए हैं। उनके पास घर, पड़ोस, नगर और माँ थी। उन्हें लगा कि उनकी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही।
2. दीवार में दरार
एक दिन लेखक को अहसास हुआ कि आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई है। उन्हें लगा कि अपने घर, पड़ोस और नगर की सीमाओं में रहते हुए भी उनकी स्थिति एकदम हीन है। कोई भी उन्हें अपमानित कर सकता है और उनके पास बदला लेने या अपील करने का भी अधिकार नहीं है।
यह दरार कोई भौतिक भूकंप नहीं, बल्कि मानसिक विचारों का भूकंप था। यह भूकंप उठा था स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय के अनुभव को पढ़कर।
3. लाला लाजपत राय का अनुभव
लाला लाजपत राय विश्व के अनेक देशों में घूमे। पर जहाँ भी गए, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक उनके माथे पर लगा रहा। यह अनुभव लेखक के लिए एक मानसिक भूकंप साबित हुआ। इससे उन्हें समझ आया कि यदि देश गुलाम हो, तो व्यक्ति चाहे कितना भी संपन्न क्यों न हो, उसे वास्तविक गौरव प्राप्त नहीं हो सकता।
4. कर्तव्य और अधिकार
इस अनुभव की छाया में लेखक को अपना कर्तव्य और अधिकार दोनों समझ आए। उनका कर्तव्य है कि वे कोई ऐसा काम न करें जिससे देश की स्वतंत्रता या सम्मान को धक्का पहुँचे। उनका अधिकार है कि देश के सम्मान और शक्तियों से अपने सम्मान की रक्षा कर सकें।
5. साधारण नागरिक की शक्ति
लेखक कहते हैं कि हर व्यक्ति सोचता है कि वह एक छोटा आदमी है, वह क्या कर सकता है? लेकिन यह सोच गलत है। "अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता" यह कहावत झूठी है। इतिहास साक्षी है कि एक-एक व्यक्ति के प्रयास से बड़े-बड़े परिवर्तन हुए हैं। युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्व होता है।
6. दो घटनाएँ - देश और नागरिक की गाँठ
➜ पहली घटना: हमारे देश के महान संत स्वामी रामतीर्थ जापान गए। रेल में उन्हें फल नहीं मिले। उनके मुँह से निकल गया - "जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते!" एक जापानी युवक ने यह सुन लिया। वह दौड़कर ताजे फल लाया और स्वामी जी को भेंट करते हुए कहा, "आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।"
इस युवक ने अपने कार्य से अपने देश का गौरव बढ़ा दिया।
➜ दूसरी घटना: एक विदेशी छात्र जापान में पढ़ने आया। उसने पुस्तकालय की एक पुस्तक से दुर्लभ चित्र निकाल लिए। उसे पकड़ा गया, जापान से निकाल दिया गया और पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया गया कि उस देश का कोई निवासी अब इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता।
एक युवक ने अपने देश का सिर ऊँचा किया, दूसरे ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगाया।
7. छोटे कार्य, बड़ी भावनाएँ
लेखक बताते हैं कि महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं, बल्कि उस कार्य के करने की भावना में है।
➜ कमालपाशा की घटना: तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा के पास एक बूढ़ा किसान 30 मील पैदल चलकर शहद की हंडिया भेंट करने आया। राष्ट्रपति ने उसे शाही सम्मान दिया और स्वयं हंडिया खोलकर शहद चखा। क्या वह शहद बहुत कीमती था? नहीं, उसके पीछे भावना थी।
➜ किसान और नेहरू जी: एक किसान ने रंगीन सूतलियों से खाट बुनी और पंडित नेहरू को भेंट की। नेहरू जी ने न केवल खाट स्वीकार की, बल्कि अपनी दस्तख्ती फोटो उपहार में दी। इसके पीछे भी भावना का सम्मान था।
8. चुनाव - उच्चता और हीनता की कसौटी
लेखक के अनुसार, देश की उच्चता और हीनता को तोलने की कसौटी चुनाव है। जिस देश के नागरिक समझदारी से वोट देते हैं, वह देश उच्च है। जो नागरिक गलत लोगों के प्रभाव में आकर मत देते हैं, वह देश हीन है।
Imp Takeaways
व्यक्ति और देश अलग-अलग नहीं हैं। देश की हीनता या गौरव का सीधा प्रभाव नागरिक पर पड़ता है और नागरिक के कार्यों से देश की छवि बनती है।
लाला लाजपत राय का कथन - "प्रगति का तात्पर्य स्वतंत्रता की ओर प्रस्थान है। जैसे ही तुममें पर-निर्भरता पनपती है, स्वतंत्रता पलायन कर जाती है।"
Translation: Progress means moving towards freedom. As soon as dependence on others enters you, freedom runs away.
हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है कि वह तन-मन-धन से अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की रक्षा करे।
Translation: It is every citizen's moral duty to protect their birth rights with body, mind, and wealth.
कार्य छोटा हो या बड़ा, यदि उसके पीछे देशभक्ति की भावना है, तो वह महान है। राष्ट्रपति कमालपाशा और पंडित नेहरू ने इसे अपने व्यवहार से सिद्ध किया।
सही मतदान एक नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है। गलत लोगों को वोट देना देश की शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध को कमजोर करता है।
निबंध की विशेषताएँ (Essay Characteristics)
इस निबंध में निबंध की सभी मुख्य विशेषताएँ मौजूद हैं। नीचे दिए गए चित्र में इन्हें देखा जा सकता है:
अभ्यास - प्रश्नों के उत्तर
मेरे उत्तर मेरे तर्क (MCQs)
| प्रश्न | सही उत्तर | व्याख्या |
|---|---|---|
| 1. "एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई" - 'दरार' किस ओर संकेत करता है? | (ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार | यह दरार लेखक की पूर्णता और आत्मसंतुष्टि के भाव पर चोट करती है। उसे एहसास होता है कि देश के गुलाम होने तक वह वास्तव में पूर्ण नहीं है। |
| 2. "ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है" - किस तरह के प्रश्न? | (ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का | ऐसे प्रश्न जो सीधे निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं, उनके उत्तर देने में विशेष आनंद आता है क्योंकि वे विचारों को स्पष्ट करते हैं। |
| 3. "पराधीनता के दीन दिन" - दीन क्यों कहा गया? | (ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था | गुलामी में लोगों की आत्मा कुचली जाती थी। उनका आत्मसम्मान और राष्ट्रीय गौरव दबा दिया जाता था, इसलिए वे दिन 'दीन' थे। |
| 4. मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि? | (ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो | लाला लाजपत राय के उदाहरण से स्पष्ट है कि यदि देश गुलाम हो, तो व्यक्ति कितना भी धनवान या शक्तिशाली क्यों न हो, उसे वास्तविक गौरव नहीं मिल सकता। |
| 5. "वह गाँठ इतनी साफ है" - गाँठ किन दो बातों को बाँधती है? | (क) देश और नागरिक | दोनों घटनाओं में यह स्पष्ट हुआ कि नागरिक के कार्य से देश की छवि बनती है। देश और नागरिक एक दूसरे से बंधे हैं। |
| 6. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है? | (ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध | पूरा निबंध इसी बात पर केंद्रित है कि व्यक्ति और देश अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। |
मेरी समझ मेरे विचार (लघु उत्तर)
प्रश्न 1: स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मूर्छ क्यों हो गए?
उत्तर: स्वामी रामतीर्थ मूर्छ इसलिए हो गए क्योंकि जापानी युवक के उत्तर में उसके देश के प्रति अपार प्रेम और आत्मसम्मान झलक रहा था। युवक ने फलों का मूल्य नहीं माँगा, बल्कि अपने देश की प्रतिष्ठा की रक्षा की शर्त रखी। उसकी देशभक्ति इतनी प्रबल थी कि वह किसी भी कीमत पर अपने देश के अपमान को सहन नहीं कर सकता था। यह भावना स्वामी जी को अपने देशवासियों से तुलना करते हुए शर्मिंदा कर गई और वे भाव-विभोर हो गए।
प्रश्न 2: जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है?
उत्तर: युवक ने फलों का कोई धन-मूल्य नहीं माँगा। उसने कहा, "आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।"
युवक की छवि एक देशभक्त, आत्मसम्मानी और प्रतिष्ठाप्रेमी नागरिक की है। वह अपने देश की छोटी से छोटी आलोचना को भी सहन नहीं कर सकता। उसके लिए देश का गौरव व्यक्तिगत लाभ से कहीं बड़ा है।
प्रश्न 3: "मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं" - इसके पीछे क्या तर्क हो सकते हैं?
उत्तर: इस कथन के पीछे गहरा तर्क है। जैसे शरीर और आत्मा अलग नहीं, वैसे ही व्यक्ति और देश अलग नहीं।
- ➜ जब कमालपाशा ने बूढ़े किसान का शहद स्वीकार किया, तो उसने उसकी भावना का सम्मान किया, न कि केवल शहद का।
- ➜ जब नेहरू जी ने किसान की खाट स्वीकार की और फोटो दी, तो यह दर्शाता है कि नेहरू जी भी खुद को जनता से अलग नहीं मानते थे।
- ➜ लेखक का कहना है कि जैसे हम अपने शरीर के लिए सोचते हैं, वैसे ही देश के लिए सोचना चाहिए। देश की हीनता हमारी हीनता है और देश का गौरव हमारा गौरव है।
मेरे अनुभव मेरे विचार (दीर्घ उत्तर)
प्रश्न 1: "देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है" - स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति नागरिक और देश के अटूट संबंध को दर्शाती है।
जब एक जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को फल देकर अपने देश का गौरव बढ़ाया, तो पूरे जापान को सम्मान मिला। इसके विपरीत, जब एक विदेशी छात्र ने जापान में चोरी की, तो उसके देश के सभी नागरिकों को प्रतिबंध का सामना करना पड़ा।
हमारे आस-पास भी यह देखा जा सकता है। जब कोई भारतीय विदेश में कुछ अच्छा करता है, तो पूरे देश को गौरवान्वित महसूस होता है। जब कोई गलत करता है, तो देश की छवि धूमिल होती है। अतः हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह ऐसा कोई कार्य न करे जिससे देश का अपमान हो।
प्रश्न 2: "मुझे बहुतों की अपने लिए ज़रूरत पड़ती थी, मैं भी बहुतों की ज़रूरत का उनके लिए जवाब था" - व्याख्या कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति पारस्परिक सहयोग और सामाजिक जीवन के अंतर्संबंध को दर्शाती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हमारा जीवन दूसरों पर निर्भर है।
सुबह उठने से लेकर रात्रि तक हम कई लोगों की सहायता लेते हैं - जैसे सब्जी वाला, दूध वाला, सफाई कर्मचारी, अध्यापक, डॉक्टर आदि। इसी प्रकार हम भी दूसरों की ज़रूरतों के जवाब होते हैं। एक छात्र के रूप में हम अपने परिवार और समाज की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करते हैं। यह पारस्परिक संबंध ही समाज को जोड़े रखता है।
प्रश्न 3: "सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता" - इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है?
उत्तर: लेखक के अनुसार जीवन एक युद्ध इसलिए है क्योंकि यहाँ हर क्षण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
युद्ध में केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि रसद पहुँचाने वाले, किसान, श्रमिक, वैज्ञानिक सभी महत्वपूर्ण होते हैं। इसी प्रकार देश की प्रगति में हर नागरिक की भूमिका अहम है। अध्यापक बच्चों को शिक्षित करते हैं, किसान अनाज उगाते हैं, श्रमिक निर्माण करते हैं, और सैनिक सीमा की रक्षा करते हैं। हम सभी अपने-अपने क्षेत्र में देश के लिए योगदान दे सकते हैं।
प्रश्न 4: "अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था" - आज के संदर्भ में पड़ोसी संबंधों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: पहले पड़ोसी संबंध बहुत गहरे होते थे। लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे। बच्चे सामूहिक रूप से खेलते थे।
आज के आधुनिक युग में पड़ोसी संबंध कमजोर होते जा रहे हैं। कारण: व्यस्त जीवन, अपार्टमेंट संस्कृति, टीवी-मोबाइल की लत। लोग एक-दूसरे को जानते तक नहीं। पड़ोसी संबंधों को मजबूत करने के लिए हमें फिर से सामूहिक उत्सव मनाने, सहायता करने और समय निकालने की आवश्यकता है।
प्रश्न 5: "क्या सुंदरता और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?"
उत्तर: लेखक के अनुसार, यदि हम सड़कों पर कचरा फेंकते हैं, गंदे शब्दों का प्रयोग करते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं, तो हम देश के सौंदर्य-बोध को ठेस पहुँचाते हैं।
हमें अपने घर, विद्यालय और आस-पास स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए। ऐतिहासिक स्थलों पर गंदगी न करें, दीवारों पर न लिखें, और पौधे लगाकर सौंदर्य बढ़ाना चाहिए।
प्रश्न 6: "मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे" - चर्चा कीजिए।
उत्तर: देश के सम्मान की रक्षा करना हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य है। इसके लिए हमें यह करना चाहिए:
- ➜ गलत लोगों को वोट न दें और चुनाव में जागरूकता दिखाएँ।
- ➜ सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें और भ्रष्टाचार का विरोध करें।
- ➜ देश की संस्कृति और विरासत को संजोएँ, विदेशी संस्कृति की अंधी नकल न करें।
- ➜ कानून का पालन करें और दूसरों को भी प्रेरित करें।
हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे देश की छवि धूमिल हो।
निर्मल जीत सिंह सेखों
निर्मल जीत सिंह सेखों का जन्म 17 जुलाई 1945 को पंजाब के लुधियाना के पास एक गाँव में हुआ। उनके पिता सरदार त्रिलोक सिंह सेखों और माता हरबंस कौर थीं। बचपन से ही वे वायुयान के प्रति आकर्षित रहे।
उन्होंने अजीतसर मोह में स्थित खालसा हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। 1962 में दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज, आगरा में दाखिला लिया। नेशनल कैडेट कोर (एन.सी.सी.) में रहते हुए उन्होंने एयरो-मॉडलिंग में रुचि दिखाई।
आसमान की सुरक्षा
1971 का युद्ध
1971 में पाकिस्तान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में हवाई हमले शुरू किए। श्रीनगर हवाई क्षेत्र की सुरक्षा के लिए नेट (Gnat) विमानों की एक टुकड़ी तैनात की गई। फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों इसी टुकड़ी में थे।
➜ 14 दिसंबर 1971: पाकिस्तानी वायुसेना के छह सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट ने श्रीनगर हवाई पट्टी पर हमला शुरू किया। उस समय सेखों रेडिनेस ड्यूटी पर थे।
जानलेवा खतरे के बावजूद उन्होंने बिना देरी उड़ान भरी। उन्होंने दो सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट को युद्ध में उलझा लिया। एक को मार गिराया और दूसरे को आग के हवाले कर दिया।
इतने में दो और सेबर लड़ाकू विमान आए। अब सेखों चार दुश्मन विमानों के खिलाफ अकेले लड़ रहे थे। उन्होंने अपनी वीरता और युद्ध-कौशल से दुश्मनों को घेर लिया। दुश्मनों की भारी संख्या के कारण अंत में उनका विमान गिरकर क्षतिग्रस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हुए।
सम्मान और स्मृति
- ➜ उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे भारतीय वायुसेना के एकमात्र परम वीर चक्र विजेता हैं।
- ➜ उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी और विवाह को केवल 10 महीने हुए थे।
- ➜ 7 अक्टूबर 1982 को भारतीय वायुसेना ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक आवरण जारी किया।
- ➜ सन् 2000 में भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट भी जारी किया।
- ➜ एयरफोर्स म्यूजियम, पालम, नई दिल्ली में उनकी प्रतिमा स्थापित है।
- ➜ फिल्म 'हिंदुस्तान की कसम' (1973) 1971 युद्ध पर आधारित है।
प्रशंसा पत्र (Citation)
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर नेट एयरक्राफ्ट लेकर उड़ान भरी। उन्होंने असाधारण वीरता, हवाई रण-कौशल और असाधारण संकल्प का परिचय देते हुए वायुसेना की परंपराओं को नई ऊँचाइयाँ दीं।
- गजट ऑफ इंडिया नोटिफिकेशन
Imp Takeaways: निर्मल जीत सिंह सेखों
सेखों ने अपने कर्तव्य को जान पर खेलकर निभाया। उनके लिए देश की रक्षा सबसे पहले थी, व्यक्तिगत सुरक्षा बाद में।
चार दुश्मन विमानों के सामने अकेले लड़ना और अपनी जान की परवाह न करना केवल असाधारण साहसी व्यक्ति ही कर सकता है।
उनका बलिदान हमें सिखाता है कि देश के लिए युवा पीढ़ी कुछ भी कर सकती है। उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी, पर उनका त्याग अमर हो गया।
निर्मल जीत सिंह सेखों - प्रश्नोत्तर
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| निर्मल जीत सिंह सेखों का जन्म कब और कहाँ हुआ? | 17 जुलाई 1945 को पंजाब के लुधियाना जिले के पास एक गाँव में। |
| उन्होंने किस कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की? | दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज, आगरा। |
| उन्होंने भारतीय वायुसेना में कब नियुक्ति पाई? | 4 जून 1967। |
| वे किस स्क्वाड्रन में शामिल हुए? | 18 स्क्वाड्रन "फ्लाइंग बुलेट्स"। |
| उन्होंने कौन-सा विमान उड़ाया? | नेट (Gnat) लड़ाकू विमान। |
| 1971 के युद्ध में उन्होंने क्या कारनामा किया? | उन्होंने अकेले छह पाकिस्तानी सेबर विमानों का सामना किया, एक गिराया, दूसरा क्षतिग्रस्त किया। |
| उन्हें कौन-सा सम्मान मिला? | परम वीर चक्र (मरणोपरांत)। |
| वे वायुसेना के इतिहास में किसलिए विशेष हैं? | वे भारतीय वायुसेना के एकमात्र परम वीर चक्र विजेता हैं। |
| उनकी प्रतिमा कहाँ स्थापित है? | एयरफोर्स म्यूजियम, पालम, नई दिल्ली में। |
| उनकी शहादत पर कौन-सी फिल्म बनी? | 'हिंदुस्तान की कसम' (1973)। |
