परिचय
सुभद्रा कुमारी चौहान (1904–1948) का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ। वे एक प्रसिद्ध कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, वीरता और स्वाधीनता संग्राम की अलख जगाने वाली भावनाएँ मिलती हैं।
‘झाँसी की रानी’ उनकी अमर कृति है, जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर रचित है। इस कविता में रानी लक्ष्मीबाई के जीवन-वृत्त, उनके संघर्ष और अंतिम बलिदान का चित्रण है।
काव्य पाठ — झाँसी की रानी
1. क्रांति का आह्वान
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी, चमक उठी सन सतावन में वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
2. बचपन और वीरता
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी, वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद जबानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध, न्यूँ की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य वेशना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार, महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
3. विवाह और विपत्ति
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, व्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, सुभट बुंदेलों की विरदावलि-सी वह आई झाँसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उज्याली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई, निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
4. अंग्रेज़ी हुकूमत का अत्याचार
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया, अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया, राजाओं नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया, रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात, कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, उदयपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन विसात, जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात, बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
5. 1857 की क्रांति
रानी रोई रनिवासों में बेगम गम से थी बेज़ार उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अख़बार, ‘नागपुर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नीलक हार’, यों परदे की इज्ज़त पर- देशी के हाथ बिकानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान, नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान, हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरतम से आई थी, झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी, जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम नाना धुंधूपंत, तांतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुंवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम, लेकिन आज जूम कहलाती उनकी जो कुर्बानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
6. युद्ध और बलिदान
इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में, जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार, यमुना-तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार, अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ समुख था, उसने मुँह की खाई थी, काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी, पर, पीछे हु रोज आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सेन्य के पार, किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार, घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार, घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
7. श्रद्धांजलि
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेईस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी, तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
पद्य व्याख्या (Stanza-wise Explanation)
क्रांति का आह्वान
बचपन और वीरता
विवाह और विपत्ति
अंग्रेज़ी हुकूमत का अत्याचार
1857 की क्रांति
युद्ध और बलिदान
श्रद्धांजलि
प्रश्नोत्तर (Exercise Solutions)
मेरे उत्तर मेरे तर्क — बहुविकल्पीय प्रश्न
(ख) विद्रोह की चिंगारी
(ग) स्वाधीनता का भय
(घ) भारत की युवावस्था
‘नई जवानी’ से तात्पर्य 1857 में उठे स्वतंत्रता संग्राम के नए उत्साह और विद्रोह की भावना से है।
(ख) शोभायुक्त
(ग) सहिष्णुता
(घ) कठोरता
‘छबीली’ शब्द का अर्थ है सुंदर, तेजस्वी और छबिवाली।
(ख) झाँसी राज्य की उम्मीदों का नष्ट हो जाना
(ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना
(घ) रानी के जीवन में उदासी होना
यहाँ झाँसी राज्य की स्वतंत्रता और उम्मीदों के समाप्त होने का संकेत है।
(ख) भारत छोड़ो आंदोलन
(ग) 1857 की क्रांति
(घ) सविनय अवज्ञा आंदोलन
यह पंक्ति 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ओर इंगित करती है।
(ख) जनरल डलहौजी के लिए
(ग) लेफ्टिनेंट वॉकर के लिए
(घ) ब्रिटिश राज के लिए
यहाँ ‘यह’ से तात्पर्य अंग्रेज़ी हुकूमत (British Rule) से है जो व्यापार के बहाने भारत आई।
मेरी समझ मेरे विचार — लघु उत्तरीय प्रश्न
Imp Points & Terms
| अलंकार / प्रयोग | उदाहरण / विवरण |
|---|---|
| तुकांतलय (Rhyme) | थी/थी — प्रत्येक चरण के अंत में समान तुक का प्रयोग |
| पुनरुक्ति (Refrain) | ‘बुंदेले हरबोलों के मुँह…’ पंक्ति की बार-बार पुनरावृत्ति |
| रूपक (Metaphor) | ‘बुझा दीप झाँसी का’ — स्वतंत्रता को दीप कहा |
| उपमा (Simile) | ‘सुभट बुंदेलों की विरदावलि-सी वह आई’ |
| मुहावरे (Idioms) | मुँह की खाना (हार मानना), पैर पसारना (अधिकार बढ़ाना) |
- 1857 की क्रांति — 10 मई 1857 को मेरठ से प्रारंभ हुआ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम।
- डलहौजी की लाप्स नीति — बिना प्राकृतिक उत्तराधिकारी के राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की नीति।
- मुख्य केंद्र — झाँसी, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, पटना, ग्वालियर।
- सहयोगी वीर — नाना साहब, तांतिया तोपे, कुंवर सिंह, अहमद शाह मौलवी, अज़ीमुल्ला खाँ।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| फिरंगी | अंग्रेज़, विलायती |
| मर्दानी | बहादुर, पुरुषोचित |
| छबीली | तेजस्वी, सुंदर, छबिवाली |
| अवतार | किसी देवता का मनुष्य रूप में जन्म |
| विरदावलि | वीरों की कीर्ति-गाथा, प्रशंसा-गीत |
| विधवा | पति की मृत्यु के बाद स्त्री |
| बिरानी | पराया, अजनबी |
| वज्र-निपात | विनाशकारी आघात |
| वीरगति | युद्ध में शहीद होना |
| अविनाशी | नाशरहित, अक्षय, नित्य |
| स्मारक | यादगार, स्मृति-चिह्न |
