भूमिका (Introduction)
‘मातृभूमि’ प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी द्वारा रचित एक देशभक्ति की कविता है। इस कविता में कवि ने भारत की प्राकृतिक सुंदरता, यहाँ की नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों तथा महापुरुषों का गुणगान किया है। कवि अपनी मातृभूमि को पुण्यभूमि, स्वर्णभूमि, जन्मभूमि और धर्मभूमि कहकर उसके प्रति अपार प्रेम और गर्व प्रकट करते हैं।
In English: In this poem, the poet expresses deep love and pride for India — praising its natural beauty (the Himalayas, rivers, birds) and the great personalities born on this sacred land.एक नज़र में — मातृभूमि की विशेषताएँ
कवि परिचय (About the Poet)
सोहनलाल द्विवेदी (1906–1988) हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे। उनका जन्म आज से लगभग सवा सौ साल पहले हुआ था। उस समय अंग्रेज़ों का भारत पर शासन था। उन्होंने अपनी लेखनी से अंग्रेज़ों का विरोध किया। उनकी लेखनी का सबसे प्रिय विषय ‘देशभक्ति’ था। भारत के गौरव का गान करना उन्हें बहुत प्रिय था। उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं — ‘बढ़े चलो, बढ़े चलो’ तथा ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’।
कविता (The Poem)
नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है।
जगमग छटा निराली, पग पग छहर रही हैं।
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।
चिड़ियाँ चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में।
बहती मलय पवन है, तन-मन सँवारती है।
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।
श्रीकृष्ण ने सुनाई, वंशी पुनीत गीता।
जग को दया सिखाई, जग को दिया दिखाया।
वह मातृभूमि मेरी, वह जन्मभूमि मेरी। — सोहनलाल द्विवेदी
Imp शब्द-अर्थ (Imp Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| हिमालय | भारत की उत्तरी सीमा पर फैली पर्वत-माला। |
| सिंधु | समुद्र / हिंद महासागर। |
| त्रिवेणी | तीन नदियों की मिली हुई धारा, संगम। |
| मलय पवन | दक्षिणी भारत के मलय पर्वत से चलने वाली सुगंधित वायु। |
| रघुपति | श्री रामचंद्र का एक नाम, दशरथ के पुत्र। |
| गीता | प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’। |
| गौतम बुद्ध | प्रसिद्ध महापुरुष, बौद्ध धर्म के प्रवर्तक। |
| अमराइयाँ | आम के घने बाग / उद्यान। |
| पुण्य-भूमि | पवित्र भूमि। |
| पग पग | हर पग / हर कदम पर। |
प्रश्न-उत्तर — मेरी समझ से (Q & A)
(1) हिंद महासागर के लिए कविता में कौन-सा शब्द आया है?
सिंधु ✔ (विकल्प: चरण, हिमालय, वंशी, सिंधु)
(2) ‘मातृभूमि’ कविता में मुख्य रूप से क्या है?
भारत की प्रशंसा की गई है। ✔
(कविता में भारत की प्राकृतिक सुंदरता, महापुरुषों तथा गौरव — सभी की प्रशंसा एक साथ है, इसलिए सबसे सटीक उत्तर ‘भारत की प्रशंसा’ है।)
सोच-विचार के लिए (Answers)
1. कोयल कहाँ रहती है?
कोयल घनी अमराइयों (आम के बागों) में रहती है।
2. तन-मन कौन सँवारती है?
बहती हुई मलय पवन तन-मन को सँवारती (ताज़ा) है।
3. झरने कहाँ से झरते हैं?
झरने मातृभूमि की पहाड़ियों में से झरते हैं।
4. श्रीकृष्ण ने क्या सुनाया था?
श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी (बाँसुरी) पर पवित्र गीता का संदेश सुनाया था।
5. गौतम ने किसका यश बढ़ाया?
गौतम बुद्ध ने अपनी मातृभूमि (भारत) का यश बढ़ाया।
‘लहर’ व ‘छहर’ पर आधारित प्रश्न
कहाँ-कहाँ छटा छहर रही है?
नदियों (गंगा, यमुना, त्रिवेणी) की जगमगाती निराली छटा पग-पग पर छहर (फैल) रही है।
किसका पानी लहर रहा है?
गंगा, यमुना और त्रिवेणी नदियों का पानी लहर रहा है।
मिलान — मिलते-जुलते भाव (Matching)
| स्तंभ 1 (पंक्ति) | स्तंभ 2 (भाव) |
|---|---|
| वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी। | मैंने उस भूमि पर जन्म लिया है। वह भूमि मेरी माँ समान है। |
| चिड़ियाँ चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में। | यहाँ की जलवायु इतनी सुखदायी है कि पक्षी पेड़-पौधों के बीच प्रसन्नता से गीत गा रहे हैं। |
| अमराइयाँ घनी हैं, कोयल पुकारती है। | यहाँ आम के घने उद्यान हैं जिनमें कोयल आदि पक्षी चहचहा रहे हैं। |
अनुमान या कल्पना से (Answers)
कोयल क्यों, किसे और कैसे पुकार रही होगी?
कोयल आम के बागों में मस्त होकर, अपने साथी को मधुर स्वर में ‘कुहू-कुहू’ की आवाज़ से पुकार रही होगी। ऋतु बसंत की सुंदरता में वह प्रसन्न होकर गा रही होगी।
पवन किसका तन-मन सँवारती है? वह यह कैसे करती है?
मलय पवन मनुष्य के तन-मन को सँवारती है। वह अपनी शीतल और सुगंधित हवा से शरीर को ताज़गी और मन को शांति देती है, जिससे थकान दूर हो जाती है।
शब्दों के रूप (Answers)
(क) युग्म शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| घर-घर | हर घर में / प्रत्येक घर। |
| बाल-बाल | हर बाल में / बहुत नज़दीक से बचना। |
| साँस-साँस | हर साँस में / प्रत्येक श्वास। |
| देश-देश | हर देश में / प्रत्येक देश। |
| पर्वत-पर्वत | हर पर्वत में / प्रत्येक पर्वत पर। |
(ख) ‘भूमि’ से बने नए शब्द
| नया शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तपोभूमि | तपस्या करने की भूमि। |
| देवभूमि | देवताओं की भूमि। |
| भारतभूमि | भारत देश की भूमि। |
| जन्मभूमि | जहाँ जन्म हुआ, वह भूमि। |
| कर्मभूमि | कर्म (काम) करने की भूमि। |
| रणभूमि | युद्ध की भूमि। |
| यज्ञभूमि | यज्ञ करने की भूमि। |
| सिद्धभूमि | सिद्धि प्राप्त करने की पवित्र भूमि। |
थोड़ा भिन्न, थोड़ा समान (Answers)
‘दया’ और ‘दिया’ में केवल एक मात्रा का अंतर है, फिर भी अर्थ पूरी तरह बदल जाता है। ऐसे ही एक-मात्रा-अंतर वाले कुछ शब्द:
| शब्द जोड़ा | अर्थ |
|---|---|
| घड़ा – घड़ी | पानी का बर्तन – समय बताने वाला यंत्र। |
| सुत – सुता | पुत्र – पुत्री। |
| बाल – बाला | केश/बच्चा – कन्या। |
| दिन – दीन | दिवस – गरीब/असहाय। |
| कमल – कमला | फूल – लक्ष्मी। |
वंशी-से — वाद्य पहचान (Answers)
‘वंशी’ बाँसुरी को कहते हैं, जो मुँह से फूँककर बजाया जाने वाला वाद्य है। शब्द-जाल से मिले फूँककर बजाए जाने वाले वाद्यों के नाम:
| चित्र-अक्षर | वाद्य का नाम |
|---|---|
| श… | शहनाई |
| बी… | बीन |
| बाँ… | बाँसुरी |
| सीं… | सींगी |
| ना… | नादस्वरम् |
| भं… | भोंपू / भंगी |
| शं… | शंख |
आज की पहेली (Answers)
| क्रम | अक्षर | शब्द |
|---|---|---|
| 1 | स म ह ग र | महासागर |
| 2 | ह म य ल | हिमालय |
| 3 | ग ग | गंगा |
| 4 | भ त र | भारत |
| 5 | ल क य | कोयल |
| 6 | व न प | पवन |
झरोखे से — वंदे मातरम्
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। भारत में इसका स्थान ‘जन गण मन’ के समान है (राष्ट्रगीत)।
| वंदे मातरम् | भावार्थ |
|---|---|
| वंदे मातरम्, वंदे मातरम्! | हे माता, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ! |
| सुजलाम्, सुफलाम्, | तुम जल से भरी हुई हो, फलों से परिपूर्ण हो, |
| मलयज शीतलाम्, | तुम्हें मलय से आती शीतल पवन ठंडक देती है, |
| शस्यश्यामलाम्, मातरम्! | तुम अन्न के खेतों से परिपूर्ण वंदनीय माता हो! |
| शुभ्रज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्, | जिसकी रात को चंद्रमा का प्रकाश सुशोभित करता है, |
| फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्, | जो खिले फूलों के पेड़ों से सुसज्जित है, |
| सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्, | सदैव हँसने वाली, मधुर भाषा बोलने वाली, |
| सुखदाम् वरदाम्, मातरम्! | सुख देने वाली, वरदान देने वाली माँ — मैं प्रणाम करता हूँ! |
साझी समझ — ‘मातृभूमि’ व ‘वंदे मातरम्’ की तुलना
| समानताएँ | भिन्नताएँ |
|---|---|
| दोनों में मातृभूमि/भारत माँ को माँ के समान माना गया है। | ‘मातृभूमि’ सरल हिंदी में है; ‘वंदे मातरम्’ संस्कृतनिष्ठ भाषा में है। |
| दोनों भारत की प्राकृतिक सुंदरता (नदी, पवन, फल) का वर्णन करते हैं। | ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत है व स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है; ‘मातृभूमि’ महापुरुषों पर अधिक बल देती है। |
| दोनों में देशभक्ति व माँ के प्रति प्रणाम का भाव है। | रचयिता अलग हैं — सोहनलाल द्विवेदी बनाम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय। |
पढ़ने के लिए — पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ देना वनमाली! उस पथ में देना तुम फेंक।
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक। — माखनलाल चतुर्वेदी
Imp बिंदु (Imp Points to Remember)
- कवि: सोहनलाल द्विवेदी (1906–1988), देशभक्ति के प्रसिद्ध कवि।
- कविता में भारत को पुण्यभूमि, स्वर्णभूमि, धर्मभूमि, कर्मभूमि, जन्मभूमि व मातृभूमि कहा गया है।
- ‘सिंधु’ शब्द हिंद महासागर के लिए आया है।
- कविता में राम, सीता, श्रीकृष्ण व गौतम बुद्ध — इन महापुरुषों का उल्लेख है।
- ‘यमुन’ शब्द कविता की लय के लिए ‘यमुना’ के स्थान पर प्रयोग हुआ है।
- वंदे मातरम् — राष्ट्रगीत, रचयिता बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय।
- यह कविता हमें अपनी मातृभूमि से प्रेम और गर्व करना सिखाती है।
