परिचय / Introduction
भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। ये स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रहे। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — गीत-फरोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी आदि। बुनी हुई रस्सी पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
यह कविता सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय लिखी गई। कवि को ब्रिटिश सरकार ने तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। जेल में रहते हुए उन्होंने यह कविता लिखी।
कहानी / Story Behind the Poem
कवि जेल की कोठरी में बंद है। बाहर लगातार बारिश हो रही है। सावन का महीना है। बादल गरज रहे हैं और पानी लगातार गिर रहा है। इस मौसम में कवि को अपने घर, परिवार, माँ, पिता, भाई-बहनों की याद बहुत तेज़ से आती है।
कवि सावन के बादलों को अपना संदेशवाहक बनाकर अपने परिवार के पास संदेश भेजना चाहता है। वह चाहता है कि बादल उसके परिवार को यह संदेश दें कि वह जेल में ठीक है, मस्त है और खुश है। लेकिन वह यह भी चाहता है कि उसके परिवार को उसकी जेल की कठिनाइयों और दुःख के बारे में कुछ न पता चले।
कविता / The Poem
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन भिगता रहा है,
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना—
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचके,
शेर के आगे न बिचके,
बोल में बादल गरजता,
काम में झँझा लरजता,
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ सात करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनको पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वप्न बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बाँधा बेटा हूँ अभागा,
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर में खोता, कहाँ हूँ
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे भी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा — कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
देर है उनका, न फाँके,
जो कि किरने झूके-झाँके,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे जों;
गगन-आँगन की लुनाई
दिशा के मन में समाई
दशा-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है रे
झाड़ आँखें बंद करके
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
तू ज़रा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हलकी चोट लग ले,
दुध की नदूनी उमग ले,
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि खम न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
है सजीले हरे सावन,
है कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब बिरस है,
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुःख झटकर ढेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
है सजीले हरे सावन,
है कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
व्याख्या / Explanation
प्रकृति और मन की छवि
कविता की शुरुआत में लगातार बरसते पानी और घने बादलों का वर्णन है। यह बाहरी प्रकृति का दृश्य कवि के भीतर चल रही उदासी, चिंता और बेचैनी को दर्शाता है।
घर की याद और परिवार
कवि को अपने घर की याद आती है जहाँ चार भाई और चार बहनें हैं। बहनें मायके आई हुई हैं। यह एक सुखी संयुक्त परिवार का चित्रण है। लेकिन कवि इस सुख से दूर है, इसीलिए वह कहता है "हाय रे परिताप के घर" — यह दुःख का घर बन गया है क्योंकि घर का एक सदस्य (कवि स्वयं) जेल में है।
माँ की छवि
कवि अपनी माँ को "बिन-पढ़ी" कहता है लेकिन साथ ही कहता है कि वह "दुख में गढ़ी" है। माँ अशिक्षित हो सकती है, लेकिन दुःख सहन करने की शक्ति उसमें अपार है। माँ की गोद में सिर रखते ही सारे दुःख समाप्त हो जाते हैं। यहाँ माँ की स्नेहमयी, दृढ़ और संवेदनशील छवि उभरती है।
पिता की छवि
पिता को "भोले बहादुर" और "वज्र-भुज" कहा गया है। उनकी भुजाएँ वज्र की तर strong हैं और हृदय नवनीत (मक्खन) की तरह कोमल है। वे मौत और शेर से नहीं डरते। वे कर्मठ किसान हैं जो खेत में काम करते हैं। लेकिन अपने पाँचवें बेटे (कवि) की याद में वे रो पड़ते हैं। यह दर्शाता है कि पिता बाहर से कठोर लग सकते हैं, लेकिन भीतर से बहुत भावुक हैं।
संघर्ष और त्याग
कवि अपने दुःख को परिवार से छिपाना चाहता है। वह बादल से कहता है कि वह परिवार को यह संदेश दे कि वह "मस्त है", "काम में व्यस्त है", उसका वजन बढ़ गया है और वह खूब खाता-पीता है। यह सब झूठ हैं जो कवि अपनों को दुःख नहीं देना चाहता। यहाँ कवि का संघर्ष, साहस और त्याग दिखाई देता है।
ध्वनि-सौंदर्य और अलंकार
कविता में झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है। ये शब्द ध्वन्यात्मक हैं जो बारिश और प्रकृति के दृश्य को जीवंत बनाते हैं। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (पुनरावृत्ति) का प्रयोग भी हुआ है — जैसे "बहुत पानी गिर रहा है" और "पिताजी जिनको बुढ़ापा" का बार-बार आना।
Imp Points / महत्त्वपूर्ण बिंदु
- प्रसंग: 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन; कवि जेल में बंद।
- मुख्य भाव: घर की याद, अकेलेपन की पीड़ा, परिवार के प्रति स्नेह और दुःख छिपाने की चाह।
- संदेशवाहक: सावन का बादल।
- माँ की विशेषता: अनपढ़ लेकिन दुःख में दृढ़; स्नेह की प्रतीक।
- पिता की विशेषता: वज्र-भुज (बाहर से कठोर), नवनीत-सा उर (भीतर से कोमल)।
- छवियाँ: बरसात, कोठरी, खुला आकाश, खेत, माँ का आँगन।
- शैली: लोकभाषा की सरलता; मैथिली/क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग (चुआ, बेला, फलानी, भौजी)।
- अलंकार: उपमा (नवनीत-सा उर), रूपक (अम्मा ठीक बादल), पुनरुक्ति।
अभ्यास – प्रश्नों के उत्तर / Exercise Solutions
मेरे उत्तर मेरे तर्क (MCQs)
| प्रश्न | सही विकल्प | तर्क / Reason |
|---|---|---|
| 1. कविता कहाँ और क्यों लिखी गई? | (ग) जेल से परिवार के लिए | कवि 1942 के आंदोलन में जेल गए थे; यह कविता जेल में रहते हुए परिवार को याद करके लिखी गई। |
| 2. लगातार बरसता पानी किस भावना का प्रतीक है? | (घ) चिंता और बेचैनी | बारिश का लगातार गिरना कवि के मन की बेचैनी, उदासी और घर की चिंता को दर्शाता है। |
| 3. कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है? | (ख) स्नेहमयी और दृढ़ | माँ अनपढ़ है लेकिन दुःख सहने की शक्ति रखती है; उसका स्नेह अपार है। |
| 4. "वज्र-भुज नवनीत-सा उर" से पिता का कौन-सा व्यक्तित्व प्रस्तुत हुआ? | (ख) साहसी और पराक्रमी | वज्र-भुज अर्थात् वज्र जैसी भुजाएँ — यह पिता की शारीरिक शक्ति और साहस को दर्शाता है। |
| 5. "एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए" किस ओर संकेत करता है? | (ख) पिता की भावुकता | पिता इतने भावुक हैं कि एक पत्ते के टूटने पर भी उनकी आँखों से धारा बह निकले। |
| 6. "हाय रे परिताप के घर" में 'परिताप' का अर्थ? | (ग) घर में दुःख का वातावरण | परिताप अत्यधिक दुःख/शोक को कहते हैं; कवि के जेल जाने से घर में दुःख का माहौल है। |
| 7. "और कहना मस्त हूँ मैं" पंक्ति का क्या तात्पर्य है? | (ख) अपने दुःख को परिजनों से छिपाना चाहता है | कवि नहीं चाहता कि उसके परिवार वालों को उसकी कठिनाइयों का पता चले। |
| 8. इस कविता में किस बात को प्रमुखता से वर्णित किया गया है? | (घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा | पूरी कविता जेल में बंद कवि के मन में उठने वाली घर की याद और अकेलापन है। |
मेरी समझ मेरे विचार (Subjective Answers)
प्रश्न 1: कविता में वर्णित पिता के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं का वर्णन कीजिए जिनसे उनका बहुआयामी रूप सामने आता है।
कविता में पिता का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे "भोले बहादुर" हैं — सीधे-सादे लेकिन बहादुर। "वज्र-भुज" होने के कारण उनमें अपार शारीरिक शक्ति है। वे मौत और शेर के सामने नहीं डरते। वे कर्मठ किसान हैं जो खेत में लौकी के बीज बोते हैं और व्यायाम करते हैं।
लेकिन "नवनीत-सा उर" से पता चलता है कि उनका हृदय बहुत कोमल है। अपने पाँचवें बेटे की याद में वे रो पड़ते हैं। एक पत्ते के टूटने पर भी उनकी आँखों से आँसू बह निकलते हैं। इस प्रकार पिता बाहर से कठोर लेकिन भीतर से भावुक और स्नेहिल हैं।
प्रश्न 2: "दुःख झटकर ढेलता हूँ" — कठिन परिस्थितियों में कवि किस प्रकार धैर्य, साहस और त्याग का परिचय देता है?
यह पंक्ति कवि के संघर्षशील स्वभाव को प्रकट करती है। जेल की कठिनाइयों के बावजूद वह अपने दुःख को झटककर दूर कर देना चाहता है। वह अपने परिवार को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि वह ठीक है।
उसका त्याग इस बात में है कि वह अपने दुःख को अपनों पर नहीं लादना चाहता। उसका साहस इस बात में है कि वह ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों से डरा नहीं। उसका धैर्य इस बात में है कि वह जेल में रहकर भी हिम्मत नहीं हारता।
प्रश्न 3: कविता में बार-बार वर्षा का वर्णन कवि के भावों को किस प्रकार व्यक्त करता है?
वर्षा का वर्णन कविता में बिंब के रूप में प्रयुक्त हुआ है। लगातार गिरता पानी कवि की निरंतर बहती आँखों और अश्रुओं का प्रतीक है। घने बादल उसके मन की उदासी और अँधेरे को दर्शाते हैं।
सावन का महीना घर की याद ताज़ा कर देता है। कवि बादलों से अपना संदेश भेजता है। इस प्रकार वर्षा केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि कवि और उसके परिवार के बीच एक संवाद का माध्यम बन जाती है।
प्रश्न 4: उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए जिनसे माँ की भावनात्मक मज़बूती का परिचय मिलता है।
निम्नलिखित पंक्तियाँ माँ की भावनात्मक मज़बूती को प्रकट करती हैं:
माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ
ये पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि माँ अनपढ़ होने के बावजूद दुःख को सहन करने की अद्भुत शक्ति रखती है। वह बाहर रो नहीं पाती, लेकिन भीतर से छटपटाती है। यह उसकी भावनात्मक मज़बूती है।
प्रश्न 5: कविता का कौन-सा अंश आपको सबसे अधिक भावनात्मक लगता है और क्यों?
जब कवि कल्पना करता है कि उसके पिता उसका नाम लेकर रो रहे हैं, माँ आँसू छिपा रही है और बहनें पागलों की तरह व्याकुल हैं — यह अंश सबसे भावनात्मक है। विशेषकर वह क्षण जब कवि बादल से कहता है कि "और कहना मस्त हूँ मैं" — यह झूठ पिता के प्रति उसके अगाध स्नेह और त्याग को दर्शाता है।
व्याकरण / Grammar
शब्द-प्रकार (पद-परिचय)
| वाक्यांश | शब्द | प्रकार |
|---|---|---|
| "बहुत पानी गिर रहा है" | पानी | संज्ञा (Noun) |
| बहुत | विशेषण (Adjective) | |
| गिर रहा है | क्रिया (Verb) | |
| "पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा" | बुढ़ापा | संज्ञा (Noun) |
| व्यापा | क्रिया (Verb) | |
| जिनको | सर्वनाम (Pronoun) | |
| "खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह" | खुले | विशेषण (Adjective) |
| वह | सर्वनाम (Pronoun) | |
| बदन | संज्ञा (Noun) | |
| फिरता | क्रिया (Verb) | |
| "एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए" | एक | विशेषण (Adjective) |
| पत्ता | संज्ञा (Noun) | |
| फूट जाए | क्रिया (Verb) | |
| "है सजीले हरे सावन, है कि मेरे पुण्य पावन" | सजीले | विशेषण (Adjective) |
| मेरे | सर्वनाम (Pronoun) | |
| सावन | संज्ञा (Noun) |
क्षेत्रीय/स्थानीय शब्द
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| चुआ | उदास, मन में चुभन |
| छिन | क्षण, पल |
| बेला | समय, बेला |
| फलानी | कोई निश्चित (अमुक) |
| भौजी | भाभी, भाई की पत्नी |
| बड़ | बरगद का वृक्ष |
| झाड़ | झटका, हिलाना |
साथ-साथ पढ़ें: तब याद तुम्हारी आती है
— रामनरेश त्रिपाठी
जब बहुत सुबह चिड़ियाँ उठकर, कुछ गीत खुशी के गाती हैं
कलियाँ दरवाज़े खोल-खोल, जब दुनिया पर मुस्काती हैं।
जब ठंडी-ठंडी हवा कहीं से, मस्ती झोंक लाती है
है जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है।।
चुपचाप चमकते तारों की, महफ़िल जब रात सजाती है
जब चाँद शान से उठता है, दिल की दुनिया जग जाती है।
कुछ पता नहीं, लेकिन ज़रूर, वह संदेशा कुछ पाती है
है जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है।।
इस कविता में कवि प्रकृति के सुंदर दृश्यों के माध्यम से ईश्वर/प्रियजन की याद करता है। जब सुबह चिड़ियाँ गाती हैं, फूल खिलते हैं और रात में चाँद-तारे चमकते हैं, तब कवि को अपने प्रिय की याद आती है।
